मई तीसरा सप्ताह

16 मई/पुण्य-तिथि

कर्मयोगी गोविन्दराव कात्रे

कुष्ठ रोगियों को समाज में प्रायः घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। कई लोग अज्ञानवश इस रोग को पूर्व जन्म के पापों का प्रतिफल मानते हैं। ऐसे लोगों की सेवा को अपने जीवन का ध्येय बनाने वाले सदाशिव गोविन्द कात्रे का जन्म देवोत्थान एकादशी (23 नवम्बर, 1901) को जिला गुना (मध्य प्रदेश) में हुआ था। धार्मिक परिवार होने के कारण उनके मन पर अच्छे संस्कार पड़े। 

आठ वर्ष की अवस्था में पिताजी के देहान्त के बाद उनके परिवार का पोषण झाँसी में उनके चाचा ने किया। पिता की छत्रछाया सिर पर न होने से गोविन्द के मन में शुरू ही दायित्वबोध जाग्रत हो गया। 1928 में उन्हें रेल विभाग में नौकरी मिली और 1930 में उनका विवाह भी हो गया।

नौकरी के दौरान ही 1943 में उनका सम्पर्क रा.स्व.संघ से हुआ। उनकी पत्नी बयोलाई भी अच्छे विचारों की थी; पर दुर्भाग्यवश साँप काटने से उसका देहान्त हो गया। अब एक छोटी पुत्री प्रभावती के पालन की जिम्मेदारी पूरी तरह गोविन्दराव पर ही आ गयी। 

उनके कष्टों का यहाँ पर ही अन्त नहीं हुआ और उन्हें कुष्ठ रोग ने घेर लिया। वे इलाज कराते रहे; पर धीरे-धीरे लोगों को इसका पता लग गया और लोग उनसे बचने लगे। उनका बिस्तर, पात्र आदि अलग रखे जाने लगे। बस वाले उन्हें बैठने नहीं देते थे। वे अपनी पुत्री के विवाह के लिए चिंतित थे; पर कोई इसके लिए तैयार नहीं होता था। अंततः सरसंघचालक श्री गुरुजी के आग्रह पर एक स्वयंसेवक ने 1952 में उनकी पुत्री से विवाह कर लिया। 

एक दिन कात्रे जी अपने सारे धन और माँ को बहिन के पास छोड़कर इलाज के लिए वर्धा आ गये। 1954 में माँ के देहान्त के बाद उन्होंने नौकरी  भी छोड़ दी और इलाज के लिए छत्तीसगढ़ में एक मिशनरी चिकित्सालय में भर्ती हो गये। वहाँ उन्होंने उस चिकित्सालय की कार्यपद्धति का अध्ययन किया। 

उन्होंने देखा कि मिशनरी लोग निर्धन रोगियों पर ईसाई बनने का दबाव डालते हैं। कात्रे जी ने उन्हें ऐसा करने से रोका। वहाँ के एक चिकित्सक डा0 आइजेक भी धर्मान्तरण के विरोधी थे। कात्रे जी ने इनके साथ प्रबन्धकों के विरुद्ध आन्दोलन किया और राज्यपाल से मिले। राज्यपाल ने कहा कि इनकी शिकायत करने से अच्छा है कि आप भी ऐसा ही काम प्रारम्भ करो। 

अब कात्रे जी के जीवन की दिशा बदल गयी। उन्होंने रा0स्व0संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी को पत्र लिखा। आर्थिक सहायता के लिए एक पत्र श्री जुगल किशोर बिड़ला को भी लिखा। धीरे-धीरे सब ओर से सहयोग होने लगा और 5 मई, 1962 को ‘भारतीय कुष्ठ निवारक संघ’ का गठन हो गया। चाँपा में भूमि मिलने से वहाँ आश्रम और चिकित्सालय प्रारम्भ हो गया। 

कात्रे जी के मधुर स्वभाव और रोगियों के प्रति हार्दिक संवेदना के कारण उस आश्रम की प्रसिद्धि बढ़ने लगी। यद्यपि कई लोग अब भी इसे उपेक्षा से ही देखते थे। एक बार वे अपनी बेटी से मिलने ग्वालियर गये, तो वहाँ भी उन्हें अपमानित होना पड़ा। इसके बाद भी उनका संकल्प नहीं डिगा। श्री गुरुजी से उनका पत्र-व्यवहार होता रहता था। इधर के प्रवास पर वे कात्रे जी से अवश्य मिलते थे। संघ के अन्य कार्यकर्ता भी इस काम में सहयोग करते थे। 

कात्रे जी इस काम की जानकारी देश के बड़े लोगों तक पहुँचाते रहते थे। राष्ट्रपति डा0 राधाकृष्णन ने इस काम की प्रशंसा करते हुए उन्हें अपने निजी कोष से 1,000 रु. भेजे। 1971 में संघ की योजना से श्री दामोदर गणेश बापट को इस सेवा प्रकल्प में भेजा गया। इससे कात्रे जी बहुत प्रसन्न हुए। 

अब तक उनका शरीर शिथिल हो चुका था। 16 मई, 1977 को उनके देहान्त के बाद चाँपा के उस आश्रम परिसर में ही उनका अन्तिम संस्कार किया गया, जिसे उन्होंने अपने खून पसीने से सींचकर बड़ा किया था।
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17 मई/पुण्य-तिथि

मानस के अंगे्रजी अनुवादक एफ.एस.ग्राउस

गोस्वामी तुलसीदास कृत श्री रामचरितमानस केवल भारत ही नहीं, तो विश्व भर के विद्वानों के लिए सदा प्रेरणास्रोत रही है। दुनिया की प्रायः सभी भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है। अंग्रेजी में सर्वप्रथम इसका अनुवाद भारत में नियुक्त अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी श्री एफ.एस.ग्राउस ने किया। 

श्री ग्राउस का जन्म 1836 ई. में विल्डेस्ट (इपस्विच) में श्री एवर्ट ग्राउस के घर में हुआ था। इनकी पढ़ाई औक्सफोर्ड के ओरियल और क्वीन्स कॉलिज में हुई। एम.ए उत्तीर्ण करने के बाद 1860 में इनका चयन बंगाल की सिविल सेवा में हो गया। 1861 में इन्हें ‘एशियाटिक सोसायटी’ का सदस्य चुना गया। इस पद पर रहते हुए इनका परिचय भारतीय इतिहास, साहित्य एवं धर्मग्रन्थों से हुआ। इसके बाद तो ये धीरे-धीरे उन्हीं में रम गये।

श्री ग्राउस का कार्यक्षेत्र मुख्यतः आगरा, मथुरा, मैनपुरी आदि रहा। इन सभी स्थानों पर इन्होंने भारतीय संस्कृति, कला और पुरातत्व का गहन अध्ययन किया। 1878-79 में ‘एशियाटिक सोसायटी जनरल’ और ‘इंडियन ऐंटिक्वरी’ में मथुरा के बारे में लिखे इनके लेख बहुत प्रशंसित हुए। बाद में इन्हें ‘मथुरा, ए डिस्ट्रिक्ट मेमोयर’ के नाम से पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया। ब्रज की संस्कृति पर यह आज भी एक प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है।

एक अंग्रेज होते हुए भी उन्होंने भारत को कभी विदेशी शासक की दृष्टि से नहीं देखा। वे भारतीय भाषाओं के बड़े प्रेमी थे। 1866 में जब एशियाटिक सोसायटी के एक अन्य वरिष्ठ सदस्य श्री बीम्स न्यायालयों में उर्दू-फारसी मिश्रित भाषा के पक्ष में बहुत बोल और लिख रहे थे, तब श्री ग्राउस ने शुद्ध हिन्दी का समर्थन किया। यद्यपि अंग्रेजों के षड्यन्त्र के कारण उनका यह प्रयास सफल नहीं हो सका। उनकी प्रशंसा में पंडित श्रीधर पाठक ने लिखा है।

अंगरेजी अरु फरासीस भाषा कौ पंडित
संस्कृत हिन्दी रसिक विविध विद्यागुन मंडित।
निज वानी में कीन्हीं तुलसीकृत रामायन
जासु अमी रस पियत आज अंगरेजी बुधगन।।

श्री ग्राउस द्वारा मानस के अंग्रेजी अनुवाद की प्रस्तावना ‘एशियाटिक सोसायटी जनरल’ में 1876 में तथा 1877 में पश्चिमोत्तर शासन के सरकारी प्रेस से इसका पहला खंड (बालकांड) प्रकाशित हुआ। 

1880 तक मानस का पूरा अनुवाद छपते ही लोकप्रिय हो गया। इसका तीन रु. मूल्य वाला पांचवां संस्करण छोटे आकार में कानपुर से 1881 में छपा। इसके आवरण पृष्ठ पर दोनों कोनों में ‘श्री’ तथा चारों ओर मानस की पंक्तियां लिखी थीं। इसका सचित्र संस्करण महाराज काशीराज के खर्च से मुद्रित हुआ।

मानस के इस अंग्रेजी अनुवाद का पहला खंड अर्थात बालकांड पद्य में, जबकि शेष सब गद्यरूप में है। इसमें उन्होंने मानस के मूल भाव और प्रवाह को निभाने का भरपूर प्रयास किया है। इससे उन्होंने दुनिया भर के अंग्रेजीभाषियों का बहुत कल्याण किया। 

लम्बे समय तक क्षयरोग से ग्रस्त रहने पर भी उनकी साहित्य साधना चलती रही। 1891 में फतेहगढ़ में नियुक्ति के समय इन्होंने पेंशन स्वीकार कर ली और इंग्लैंड जाकर सर्रे में रहने लगे। वहीं 17 मई, 1893 को उनकी आत्मा श्रीराम के चरणों में लीन हो गयी। 

जिस श्रद्धाभाव से श्री ग्राउस ने मानस का अनुवाद किया, वह प्रशंसनीय है। इनके देहांत का समाचार पाकर पंडित श्रीधर पाठक ने लिखा -

हाय गुरु, साहब ठाकुरजी मानन वारे
कहां गये तजि हमें, हमारे परम पियारे।।

(संदर्भ : दैनिक जागरण, 11.4.2008)
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18 मई/जन्म-दिवस

परिवार के मुखिया बैरिस्टर नरेन्द्रजीत सिंह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में संघचालक की भूमिका परिवार के मुखिया की होती है। बैरिस्टर नरेन्द्रजीत सिंह ने उत्तर प्रदेश में इस भूमिका को जीवन भर निभाया। उनका जन्म 18 मई, 1911 को कानपुर के प्रख्यात समाजसेवी रायबहादुर श्री विक्रमाजीत सिंह के घर में हुआ था। शिक्षाप्रेमी होने के कारण इस परिवार की ओर से कानुपर में कई शिक्षा संस्थाएं स्थापित की गयीं।

नरेन्द्र जी की शिक्षा स्वदेश व विदेश में भी हुई। लंदन से कानून की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे बैरिस्टर बने। वे न्यायालय में हिन्दी में बहस करते थे। उन्होंने प्रसिद्ध लेखकों के उपन्यास पढ़कर अपनी हिन्दी को सुधारा। कम्पनी लाॅ के वे विशेषज्ञ थे, उनकी बहस सुनने दूर-दूर से वकील आते थे। 

1935 में उनका विवाह जम्मू-कश्मीर राज्य के दीवान बद्रीनाथ जी की पुत्री सुशीला जी से हुआ। 1944 में वे पहली बार एक सायं शाखा के मकर संक्रांति उत्सव में मुख्य अतिथि बनकर आये। 1945 में वे विभाग संघचालक बनाये गये। 1947 में श्री गुरुजी ने उन्हें प्रांत संघचालक घोषित किया।  

नरेन्द्र जी का परिवार अत्यधिक सम्पन्न था; पर शिविर आदि में वे सामान्य स्वयंसेवक की तरह सब काम स्वयं करते थे। उन्होंने अपने बच्चों को संघ से जोड़ा और एक पुत्र को तीन वर्ष के लिए प्रचारक भी बनाया। 1948 ई0 के प्रतिबंध के समय उन्हें कानपुर जेल में बंद कर दिया गया। कांग्रेसी गुंडों ने उनके घर पर हमला किया। शासन चाहता था कि वे झुक जाएं; पर उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि संघ का काम राष्ट्रीय कार्य है और वह इसे नहीं छोड़ेंगे। 

उनके बड़े भाई ने संदेश भेजा कि अब पिताजी नहीं है। अतः परिवार का प्रमुख होने के नाते मैं आदेश देता हूं कि तुम जेल मत जाओ; पर बैरिस्टर साहब ने कहा कि इस अन्याय के विरोध में परिवार को भी समर्पित करना पड़े, तो वह कम है। वे जेल में सबके साथ सामान्य भोजन करते और भूमि पर ही सोते थे। 1975 में आपातकाल में भी वे जेल में रहे। जेल में मिलने आते समय उनके परिजन फल व मिष्ठान आदि लाते थे। वे उसे सबके साथ बांटकर ही खाते थे।

बैरिस्टर साहब के पूर्वज पंजाब के मूल निवासी थे। वे वहां से ही सनातन धर्म सभा से जुड़े थे। 1921 में उनके पिता श्री विक्रमाजीत सिंह ने कानपुर में ‘सनातन धर्म वाणिज्य महाविद्यालय’ की स्थापना की। इसके बाद तो इस परिवार ने सनातन धर्म विद्यालयों की शृंखला ही खड़ी कर दी। 

बैरिस्टर साहब एवं उनकी पत्नी (बूजी) का दीनदयाल जी से बहुत प्रेम था। उनकी हत्या के बाद कानपुर में हुई श्रद्धांजलि सभा में बूजी ने उनकी स्मृति में एक विद्यालय खोलने की घोषणा की। उनके परिवार द्वारा चलाये जा रहे सभी विद्यालयों की पूरे प्रदेश में धाक है। विद्यालयों से उन्हें इतना प्रेम था कि उनके निर्माण में धन कम पड़ने पर वे अपने पुश्तैनी गहने तक बेच देते थे। मेधावी छात्रों से वे बहुत प्रेम करते थे। जब भी कोई निर्धन छात्र अपनी समस्या लेकर उनके पास आता था, तो वे उसका निदान अवश्य करते थे। 

वे बहुत सिद्धांतप्रिय थे। एक बार उनके घर पर चीनी समाप्त हो गयी। बाजार में भी चीनी उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने अपने विद्यालय के छात्रावास से कुछ चीनी मंगायी; पर साथ ही उसका मूल्य भी भेज दिया। उनका मत था कि राजनीति में चमक-दमक तो बहुत है; पर उसके माध्यम से जितनी समाज सेवा हो सकती है, उससे अधिक बाहर रहकर की जा सकती है। 

बैरिस्टर साहब देश तथा प्रदेश की अनेक धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारी थे। जब तक स्वस्थ रहे, तब तक प्रत्येक काम में वे सहयोग देते रहे।  31 अक्तूबर, 1993 को उनका शरीरांत हुआ। उन्होंने अपने व्यवहार से प्रमाणित कर दिखाया कि परिवार के मुखिया को कैसा होना चाहिए।
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19 मई/जन्म-दिवस

आधुनिक लद्दाख के निर्माता कुशक बकुला रिम्पोछे 

भगवान बुद्ध के शरीर त्याग के समय उनके 16 शिष्यों ने प्रतिज्ञा ली  थी कि जब तक उनके विचार पूरे विश्व में नहीं फैलेंगे, तब तक वे मोक्ष से दूर रहकर बार-बार जन्म लेंगे और यह काम पूरा करेंगे। इन 16 में से एक कुशोक बकुला अब तक 20 बार जन्म ले चुके हैं। उनके 19वें अवतार थे श्री लोबजंग थुबतन छोगनोर, जो कुशक बकुला रिम्पोछे के नाम से प्रसिद्ध हुए।

श्री रिम्पोछे का जन्म 19 मई, 1917 को लेह (लद्दाख) के पास माथो गांव के एक राज परिवार में हुआ था। 1922 में 13वें दलाई लामा ने उन्हें 19वां कुशक बकुला घोषित किया। तिब्बत की राजधानी ल्हासा के द्रेपुंग वि.वि. में उन्होंने 14 वर्ष तक बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया। 1940 में लद्दाख वापस आकर उन्होंने अपना जीवन देश, धर्म और समाज को समर्पित कर दिया। अब वे संन्यासी बनकर भ्रमण करने लगे। 1947-48 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया। श्री रिम्पोछे ने भारतीय सेना के साथ मिलकर इसे विफल किया और लद्दाख को बचा लिया। 1949 में नेहरू जी आग्रह पर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और लद्दाख के नव निर्माण में लग गये।

जम्मू-कश्मीर में सत्ता पाते ही शेख अब्दुल्ला ने ‘लैंड सीलिंग एक्ट’ बना दिया। अब कोई व्यक्ति या संस्था 120 कनाल से अधिक भूमि नहीं रख सकती थी। इसका उद्देश्य विशाल बौद्ध मठों और मंदिरों की भूमि कब्जाना था। श्री रिम्पोछे ने सभी मठों के प्रमुखों के साथ ‘अखिल लद्दाख गोम्पा समिति’ बनायी। फिर वे शेख अब्दुल्ला, नेहरू जी और डा. अम्बेडकर से मिले। डा. अम्बेडकर के हस्तक्षेप से यह कानून वापस हुआ। 1951 में जम्मू-कश्मीर संविधान सभा बनने पर वे निर्विरोध उसके सदस्य निर्वाचित हुए। उन्होंने विधानसभा में लद्दाख के भारत में एकीकरण का समर्थन तथा जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग होने का अधिकार देने का खुला विरोध किया।

श्री रिम्पोछे का मंगोलिया के सांस्कृतिक पुनर्जागरण में भी बड़ा योगदान है। मंगोलिया में मान्यता थी कि एक समय ऐसा आएगा, जब वहां बौद्ध विहारों, गं्रथों तथा भिक्षुओं को काफी खराब समय देखना होगा। फिर भारत से एक अर्हत आकर इसे ठीक करेंगे। और सचमुच यही हुआ। 1924 में साम्यवादी शासन आते ही हजारों भिक्षु मार डाले गये। धर्मग्रंथ तथा विहार जला दिये गये। ऐसे में 1990 में श्री रिम्पोछे भारत के राजदूत बनाकर वहां भेजे गये।

उनके वहां जाने के कुछ समय बाद शासन और लोकतंत्र समर्थकों में सशस्त्र संघर्ष छिड़ गया। श्री रिम्पोछे ने लोकतंत्र प्रेमियों को अहिंसा के संदेश के साथ ही हाथ पर बांधने के लिए एक अभिमंत्रित धागा दिया। लोकतंत्र प्रेमियों ने अपने बाकी साथियों के हाथ पर भी वह धागा बांध दिया। तभी शासन ने भी हिंसा छोड़कर शांति और लोकतंत्र बहाली की घोषणा कर दी। 10 वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने बंद मठ और विहारों को खुलवाया तथा बौद्ध अध्ययन के लिए एक महाविद्यालय स्थापित किया। उनके योगदान के लिए मंगोलिया शासन ने उन्हें अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पोलर स्टार’ प्रदान किया।

श्री रिम्पोछे लद्दाख से दो बार विधायक तथा दो बार सांसद बनेे। 1978 से 89 तक वे अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य रहे। 1988 में शासन ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया। चार नवम्बर, 2003 को उनका निधन तथा 16 नवम्बर को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हुआ। 2005 में बौद्ध परम्परा के अनुसार 20वें कुशक बकुला की पहचान कर ली गयी है। 

(संदर्भ : ज-क अध्ययन केंद्र का पत्रक)
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19 मई/जन्म-दिवस

संघर्षप्रिय एवं जुझारू मधुसूदन जी

मधुसूदन जी का जन्म 19 मई, 1956 को ग्राम सीसवाली (जिला बारां, राजस्थान) में श्री प्रभुलाल मोरवाल के घर में हुआ था। घर में कुछ खेती भी थी; पर उनके परिवार में बाल काटने का पुश्तैनी काम होता था। यद्यपि नयी पीढ़ी के लोग शिक्षित होकर निजी और सरकारी सेवाओं में भी जा रहे थे। अपने गांव में रहते हुए उन्होंने ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ के माध्यम से छात्रों के हित में संघर्ष किया। इससे वे शीघ्र ही विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय हो गये। 

1973 से 75 तक वे राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, सीसवाली में छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे। इस दौरान उनके कार्य से छात्र और अध्यापकों के साथ ही क्षेत्र के अन्य बड़े लोग भी प्रभावित हुए। छात्र संघ का कार्य करते हुए उनका संपर्क संघ से हुआ। वे संघ के उद्देश्य तथा कार्यशैली से बहुत प्रभावित हुए। अब वे विद्यार्थी परिषद के साथ ही संघ में भी सक्रिय हो गये। 

इसी समय 1975 में देश में आपातकाल लग गया। संघ पर प्रतिबंध के कारण इस समय प्रत्यक्ष शाखा का काम स्थगित था; पर तानाशाही के विरुद्ध हो रहे संघर्ष में रीढ़ की भूमिका संघ के कार्यकर्ता ही निभा रहे थे। भूमिगत पर्चे एवं समाचार पत्रों को छापकर उन्हें सामान्य जनता, पुलिस, प्रशासन और समाज के प्रमुख लोगों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य स्वयंसेवक ही कर रहे थे। 

सत्याग्रह एवं जेल भरो आंदोलन के ऐसे भीषण दौर में मधुसूदन जी ने भी सत्याग्रह कर अपनी गिरफ्तारी दी। संघ से प्रतिबन्ध हटाओ, लोकतंत्र अमर रहे, जयप्रकाश जिन्दाबाद, तानाशाही मुर्दाबाद.. आदि नारों से उन्होंने आकाश गुंजा दिया। प्रशासन ने उन्हें कोटा की केन्द्रीय कारागर में बंद कर दिया।  

जेल के नाम से मन में अनेक आशंकाएं जन्म लेती हैं; पर आपातकाल में संघ के स्वयंसेवकों के लिए जेल प्रशिक्षण केन्द्र जैसे बन गये थे। वहां वरिष्ठ कार्यकर्ता छोटे तथा नये कार्यकर्ताओं को शारीरिक तथा बौद्धिक का प्रशिक्षण देते थे। इसके साथ ही वे कार्यकर्ताओं की जिज्ञासाओं का समाधान कर उनका वैचारिक पक्ष भी मजबूत करते थे। 

एक परिवार की तरह रहने के कारण वहां सदा मौज-मस्ती का माहौल बना रहता था। कई कार्यकर्ताओं की आंतरिक प्रतिभाओं का वहां विकास हुआ। जेल में बंद अन्य विचारधारा के लोग भी संघ के संपर्क में आये, जिससे उनके मन के भ्रम दूर हुए। जेल में रह रहे अन्य संस्थाओं तथा राजनीतिक दलों के लोग प्रायः दुखी रहते थे; पर स्वयंसेवक दोनों समय की शाखा और अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहते थे। छात्र वहां रहकर अपनी पढ़ाई भी करते थे। 

इस वातावरण में मधुसूदन जी के विचार परिपक्व हुए और उन्होंने प्रचारक बनने का संकल्प लिया; पर इसमें उनका गृहस्थ-जीवन बाधक था। उन्होंने अपनी पत्नी तथा घर वालों को समझा कर अपने संकल्प में सहयोग देने के लिए तैयार कर लिया। 

मधुसूदन जी नये लोगों से शीघ्र ही मित्रता कर लेते थे। शारीरिक तथा व्यवस्था संबंधी कार्यों में भी उनकी रुचि थी। वे धौलपुर, बयाना, हिंडौन सिटी, जोधपुर, बाड़मेर आदि स्थानों पर जिला प्रचारक रहे। इसके बाद कुछ समय उन्होंने श्रीगंगानगर में विभाग प्रचारक के नाते काम किया। वर्ष 2000 में उन्हें ‘भारतीय किसान संघ’ में जयपुर प्रांत का संगठन मंत्री बनाया गया। 

भारतीय किसान संघ का काम करते हुए उनके जीवन में कुछ मानसिक कष्ट और अवसाद के क्षण आये, जिनके कारण 27 जून, 2002 को उनका दुखद देहांत हो गया। 

(संदर्भ : अभिलेखागार, भारती भवन, जयुपर)
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20 मई/पुण्य-तिथि

स्वदेशी आन्दोलन के प्रवर्तक विपिन चन्द्र पाल

स्वतन्त्रता आन्दोलन में देश भर में प्रसिद्ध हुई लाल, बाल, पाल नामक त्रयी के एक स्तम्भ विपिनचन्द्र पाल का जन्म सात नवम्बर, 1858 को ग्राम पैल (जिला श्रीहट्ट, वर्तमान बांग्लादेश) में श्री रामचन्द्र पाल एवं श्रीमती नारायणी के घर में हुआ था। बचपन में ही इन्हें अपने धर्मप्रेमी पिताजी के मुख से सुनकर संस्कृत श्लोक एवं कृत्तिवास रामायण की कथाएँ याद हो गयी थीं। 

विपिनचन्द्र प्रारम्भ से ही खुले विचारों के व्यक्ति थे। 1877 में वे ब्रह्मसमाज की सभाओं में जाने लगे। इससे इनके पिताजी बहुत नाराज हुए; पर विपिनचन्द्र अपने काम में लगे रहे। शिक्षा पूरी कर वे एक विद्यालय में प्रधानाचार्य बन गये। लेखन और पत्रकारिता में रुचि होने के कारण उन्होंने श्रीहट्ट तथा कोलकाता से प्रकाशित होने वाले पत्रों में सम्पादक का कार्य किया। इसके बाद वे लाहौर जाकर ‘ट्रिब्यून’ पत्र में सहसम्पादक बन गये। लाहौर में उनका सम्पर्क पंजाब केसरी लाला लाजपतराय से हुआ। उनके तेजस्वी जीवन व विचारों का विपिनचन्द्र के जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा।

विपिनचन्द्र जी एक अच्छे लेखक भी थे। बंगला में उनका एक उपन्यास तथा दो निबन्ध संग्रह उपलब्ध हैं। 1890 में वे कलकत्ता लाइब्रेरी के सचिव बने। अब इसे ‘राष्ट्रीय ग्रन्थागार’ कहते हैं। 1898 में वे इंग्लैण्ड तथा अमरीका के प्रवास पर गये। वहाँ उन्होंने भारतीय धर्म, संस्कृति तथा सभ्यता की विशेषताओं पर कई भाषण दिये। इस प्रवास में उनकी भेंट भगिनी निवेदिता से भी हुई। भारत लौटकर वे पूरी तरह स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रयासों में जुट गये।

अब उन्होंने ‘न्यू इंडिया’ नामक साप्ताहिक अंग्रेजी पत्र का सम्पादन किया। इनका जोर आन्दोलन के साथ-साथ श्रेष्ठ व्यक्तियों के निर्माण पर भी रहता था। कांग्रेस की नीतियों से उनका भारी मतभेद था। वे स्वतन्त्रता के लिए अंग्रेजों के आगे हाथ फैलाना या गिड़गिड़ाना उचित नहीं मानते थे। वे उसे अपना अधिकार समझते थे तथा अंग्रेजों से छीनने में विश्वास करते थे। इस कारण शीघ्र ही वे बंगाल की क्रान्तिकारी गतिविधियों के केन्द्र बन गये।

1906 में अंग्रेजों ने षड्यन्त्र करते हुए बंगाल को हिन्दू तथा मुस्लिम जनसंख्या के आधार पर बाँट दिया। विपिनचन्द्र पाल के तन-मन में इससे आग लग गयी। वे समझ गये कि आगे चलकर इसी प्रकार अंगे्रज पूरे देश को दो भागों में बाँट देंगे। अतः उन्होंने इसके विरोध में उग्र आन्दोलन चलाया। 

स्वदेशी आन्दोलन का जन्म बंग-भंग की कोख से ही हुआ। पंजाब में लाला लाजपतराय तथा महाराष्ट्र में लोकमान्य  बाल गंगाधर तिलक ने इस आग को पूरे देश में फैला दिया। विपिनचन्द्र ने जनता में जागरूकता लाने के लिए 1906 में ‘वन्देमातरम्’ नामक दैनिक अंग्रेजी अखबार भी निकाला।

धीरे-धीरे उनके तथा अन्य देशभक्तों के प्रयास रंग लाये और 1911 में अंग्रेजों को बंग-भंग वापस लेना पड़ा। इस दौरान उनका कांग्रेस से पूरी तरह मोहभंग हो गया। अतः उन्होंने नये राष्ट्रवादी राजनीतिक दल का गठनकर उसके प्रसार के लिए पूरे देश का भ्रमण किया। 

वे अद्भुत वक्तृत्व कला के धनी थे। अतः उन्हें सुनने के लिए भारी भीड़ उमड़ती थी। एक बार अंग्रेजों ने श्री अरविन्द के विरुद्ध एक मुकदमे में गवाही के लिए विपिनचन्द्र को बुलाया; पर उन्होंने गवाही नहीं दी। अतः उन्हें भी छह माह के लिए जेल में ठूँस दिया गया।

आजीवन क्रान्ति की मशाल जलाये रखने वाले इस महान देशभक्त का निधन आकस्मिक रूप से 20 मई, 1932 को हो गया।
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20 मई/जन्म-दिवस

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत

अपनी कविता के माध्यम से प्रकृति की सुवास सब ओर बिखरने वाले  कवि श्री सुमित्रानंदन पंत का जन्म कौसानी (जिला बागेश्वर, उत्तराखंड) में 20 मई, 1900 को हुआ था। जन्म के कुछ ही समय बाद मां का देहांत हो जाने से उन्होंने प्रकृति को ही अपनी मां के रूप में देखा और जाना। 

दादी की गोद में पले बालक का नाम गुसाई दत्त रखा गया; पर कुछ बड़े होने पर उन्होंने स्वयं अपना नाम सुमित्रानंदन रख लिया। सात वर्ष की अवस्था से वे कविता लिखने लगे थे। कक्षा सात में पढ़ते हुए उन्होंने नेपोलियन का चित्र देखा और उसके बालों से प्रभावित होकर लम्बे व घुंघराले बाल रख लिये।

प्राथमिक शिक्षा के बाद वे बड़े भाई देवीदत्त के साथ काशी आकर क्वींस कॉलिज में पढे़। इसके बाद प्रयाग से उन्होंने इंटरमीडियेट उत्तीर्ण किया। 1921 में ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान जब गांधी जी ने सरकारी विद्यालय, नौकरी, न्यायालय आदि के बहिष्कार का आह्नान किया, तो उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और घर पर रहकर ही हिन्दी, संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी का अध्ययन किया। 

प्रयाग उन दिनों हिन्दी साहित्य का गढ़ था। अतः वहां का वातावरण उन्हें रास आ गया। 1955 से 1962 तक वे प्रयाग स्थित आकाशवाणी स्टेशन में मुख्य कार्यक्रम निर्माता तथा परामर्शदाता रहे। भारत में जब टेलीविजन के प्रसारण प्रारम्भ हुए, तो उसका भारतीय नामकरण ‘दूरदर्शन’ उन्होंने ही किया था। 

जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा के साथ वे छायावाद के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उन्होंने गेय तथा अगेय दोनों तरह की कविताएं लिखीं। वे आजीवन अविवाहित रहे; पर उनके काव्य में नारी को मां, पत्नी, सखी, प्रिया आदि विविध रूपों में सम्मान सहित दर्शाया गया है। उनका सम्पूर्ण साहित्य ‘सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्’ के आदर्शों से प्रभावित है। 

उनकी प्रारम्भिक कविताओं में प्रकृति प्रेम के रमणीय चित्र मिलते हैं। दूसरे चरण में वे छायावाद की सूक्ष्म कल्पनाओं और कोमल भावनाओं से खेलते हुए नजर आते हैं। इसके बाद उनका झुकाव फ्रायड और मार्क्सवाद की ओर हुआ। इसके प्रसार हेतु 1938 में उन्होंने ‘रूपाभ’ नामक मासिक पत्रिका भी निकाली; पर पांडिचेरी में श्री अरविन्द के दर्शन से वामपंथ का यह नशा उतर गया और फिर उन्होंने मानव कल्याण से संबंधित कविताएं लिखीं। 

पंत जी के जीवन के हर पहलू में काव्य की मधुरता और सौंदर्य की छवि दिखाई देती है। सरस्वती पत्रिका के सम्पादक श्री देवीदत्त शुक्ल को उनके बालों में भी कवित्व के दर्शन होते थे। दर्जी के पास घंटों खड़े रहकर वे कपड़ों के लिए अपनी पंसद के नये-नये कलात्मक डिजाइन बनवाते थे।

पंत जी की प्रारम्भिक कविताएं ‘वीणा’ में संकलित हैं। उच्छवास तथा पल्लव उनकी छायावादी कविताओं का संग्रह है। ग्रंथी, गुंजन, लोकायतन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, कला और बूढ़ा चांद, चिदम्बरा, सत्यकाम आदि उनकी अन्य प्रमुख कृतियां हैं। उन्होंने पद्य नाटक और निबन्ध भी लिखे। उनके जीवन काल में ही 28 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं।

‘पद्मभूषण’ तथा ‘साहित्य अकादमी’ सम्मान से अलंकृत पंत जी को ‘चिदम्बरा’ के लिए ज्ञानपीठ तथा ‘लोकायतन’ के लिए सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला। ज्ञानपीठ पुरस्कार से प्राप्त राशि उन्होंने एक संस्था को दे दी। 

सैकड़ों मान-सम्मानों से विभूषित, प्रकृति के इस सुकुमार कवि का 28 दिसम्बर, 1977 को निधन हुआ। उनकी स्मृति में कौसानी स्थित उनके घर को ‘सुमित्रानंदन पंत वीथिका’ नाम से एक संग्रहालय बना दिया गया है, जहां उनकी निजी वस्तुएं, पुस्तकों की पांडुलिपियां, सम्मान पत्र आदि रखे हैं।

(संदर्भ : प्रभासाक्षी, दैनिक जागरण, विकीपीडिया..आदि)
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21 मई/जन्म-दिवस

प्रेरणा स्तम्भ राजाभाऊ सावरगांवकर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और झारखंड प्रान्त के कार्यकर्ताओं के प्रेरणा स्तम्भ राजाभाऊ का जन्म ग्राम डेहणी (यवतमाल, महाराष्ट्र) में श्री पाण्डुरंग सावरगाँवकर के घर में 21 मई, 1920 को हुआ था। उनके जन्म वाले दिन नृसिंह चतुर्दशी थी। इसलिए उनका नाम नरहरि रखा गया। इस प्रकार उनका पूरा नाम हुआ नरहरि पांडुरंग सावरगाँवकर; पर महाराष्ट्र में प्रायः कुछ घरेलू नाम भी प्रचलित हो जाते हैं। वे अपने ऐसे नाम ‘राजाभाऊ’ से ही पूरे बिहार और देश में विख्यात हुए।

खेलकूद में रुचि के कारण वे 11 वर्ष की अवस्था में ही शाखा जाने लगे थे। जब वे छह-सात साल के ही थे, तब संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार यवतमाल इनके किसी सम्बन्धी के घर आये थे। वहाँ उन्होंने बड़े स्नेह से राजाभाऊ का हाथ पकड़कर उन्हें शाखा जाने को कहा था। राजाभाऊ ने पूज्य डा. जी के इस आग्रह को स्वीकार किया और जीवन भर निभाया।

राजाभाऊ बड़े कठोर और अनुशासित स्वयंसेवक थे। विद्यालय के समय में ही इन्होंने स्वातंत्र्य वीर सावरकर को अपना आदर्श नायक और प्रेरणास्रोत मान लिया था। आगे चलकर उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.एस-सी. और फिर कानून की पढ़ाई की। उस समय श्री माधव सदाशिव गोलवलकर भी वहीं थे। उनके आग्रह पर वे काशी में ही संघ का काम करने लगे। 

जब उन्हें छुट्टियों में विस्तारक बनाकर ग्रामीण क्षेत्र में भेजा गया, तो उन्हें हिन्दी बोलनी भी नहीं आती थी। इतना ही नहीं, उन्हें शाखा में प्रचलित केवल एक ही खेल (नेता की खोज) आता था; पर धीरे-धीरे अपनी लगन से राजाभाऊ ने सब कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर अनेक नयी शाखाएँ खोलीं।

राजाभाऊ ने संघ के तीनों वर्ष का प्रशिक्षण क्रमशः 1939, 40 तथा 41 में प्राप्त किया। उनकी संघ के शारीरिक कार्यक्रमों में अत्यधिक रुचि थी। इस कारण वे आग्रहपूर्वक प्रतिवर्ष संघ शिक्षा वर्ग में शिक्षक रहते थे। उन्हें दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और रज्जू भैया जैसे वरिष्ठ लोगों को प्रशिक्षण देने का सौभाग्य मिला। अतः ये सब लोग भी उनका बहुत आदर एवं सम्मान करते थे। 1944 में प्रचारक जीवन स्वीकार करने पर उन्हें बिहार भेजा गया। फिर तो उन्होंने अन्तिम साँस भी वहीं ली।

संघ कार्य में प्रचारक के नाते उन्होंने बिहार में छपरा जिला, पटना महानगर, धनबाद विभाग, दक्षिण बिहार प्रान्त बौद्धिक प्रमुख, वनवासी कल्याण आश्रम (झारखंड प्रान्त) के मार्गदर्शक आदि के दायित्व निभाए। इतने वरिष्ठ प्रचारक होने के बाद भी उनके मन में बड़ेपन का कोई अभिमान नहीं था। बिहार के अधिकांश प्रचारक और कार्यकर्ता उनसे अवस्था और अनुभव में छोटे थे। इसके बाद भी वे उनके बौद्धिक और चर्चा बड़े ध्यान से सुनते थे।

वृद्धावस्था एवं बीमारी के कारण उनका प्रवास बन्द हो गया था। वे राँची में झारखंड के प्रान्तीय कार्यालय पर ही रहते थे। 28 मार्च, 2000 को झारखंड के पूर्व प्रान्त संघचालक मदन बाबू का देहान्त हो गया। राजाभाऊ की उनसे बहुत निकटता थी। वे अपने पुराने साथी की अन्त्येष्टि में भाग लेने के लिए अविलम्ब कोलकाता चले गये; पर यह प्रवास उन्हें बहुत भारी पड़ा। 

कोलकाता से लौटते ही उनका स्वास्थ्य अचानक बिगड़ गया। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया; पर भरपूर उपचार के बाद भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ। अस्पताल में ही 10 अपै्रल, 2000 को उन्होंने अन्तिम साँस ली। इस प्रकार 1944 में प्रारम्भ हुए उनके प्रचारक जीवन को स्थायी विश्राम मिल गया।
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21 मई/पुण्य-तिथि

जीवन दीप जलाने वाले गिरिराज प्रसाद जी


संघ के कार्यक्रमों में गीत और कविताओं का विशेष महत्व रहता है। उत्तर प्रदेश में ‘ताऊ जी’ के नाम से प्रसिद्ध श्री गिरिराज प्रसाद जी के मुख से ‘‘जीवन दीप जले ऐसा, सब जग को ज्योति मिले’’ तथा ‘‘पथ भूल न जाना पथिक कहीं’’ जैसे गीत सुनकर सब लोग भावविभोर हो जाते थे। 

गिरिराज जी का जन्म मथुरा जिले में दीनदयाल जी के पैतृक ग्राम नगला चंद्रभान (फरह) के निकट परखम ग्राम में हुआ था। उनके पिता श्री गेंदालाल तथा माता श्रीमती पार्वती देवी थीं। बचपन से ही उन्हें कुश्ती का बहुत शौक था। संघ के सम्पर्क में आकर वे 1958 में प्रचारक बन गये। यद्यपि वे गृहस्थ थे; पर उन्होंने गृहस्थी की अपेक्षा भारत माता की सेवा को अधिक महत्व दिया।

गिरिराज जी अत्यधिक सादगी पसंद व्यक्ति थे। वे बरेली, आगरा, मथुरा, सीतापुर आदि स्थानों पर जिला प्रचारक रहे। एक बार उन्होंने निश्चय किया कि वे धन को नहीं छुएंगे। यह बड़ा कठिन व्रत था; पर लम्बे समय तक उन्होंने इसे निभाया। पूरे जिले में वे साइकिल से प्रवास करते थे। 

एक बार बरेली में बाढ़ के समय उन्हें साइकिल सहित नाव में बैठकर नदी पार करनी पड़ी। नाविक यह देखकर हैरान रह गया कि उनकी जेब में एक भी पैसा नहीं था; पर गिरिराज जी ने अगले दिन एक कार्यकर्ता को भेजकर उसका पैसा चुका दिया। जब वरिष्ठ अधिकारियों को यह पता लगा, तो उन्होंने इसके लिए मना किया। गिरिराज जी ने आदेश का पालन करते हुए हनुमान जी को एक रुपये का प्रसाद चढ़ाया और यह निश्चय वापस ले लिया।

गिरिराज जी काम का प्रारम्भ स्वयं से ही करते थे।  उन्होंने ‘जम्मू-कश्मीर सत्याग्रह’ में अपने परिवार को तथा ‘गोरक्षा सत्याग्रह’ में अपने गांव के निकटवर्ती 22 गांवों के लोगों को भेजा। एक बार उनके छोटे भाई ने प्रधान का चुनाव लड़ा। उसने कहा कि आप भी एक दिन के लिए गांव आ जाएं। इस पर उन्होंने कहा कि प्रचारक का काम शाखा चलाना है, वोट मांगना नहीं।

आपातकाल में वे आगरा में जिला प्रचारक थे। पुलिस ने उन पर मीसा लगा दिया; पर वे पकड़ में नहीं आये। इस पर पुलिस ने सामान सहित उनके घर को ही अपने कब्जे में कर लिया; लेकिन गिरिराज जी डिगे नहीं। 1976 में रक्षाबंधन वाले दिन किसी की मुखबिरी पर पुलिस ने इन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया, जहां से वे आपातकाल की समाप्ति पर ही बाहर आ सके। 

1978 में उन्हें पश्चिमी उ.प्र. में ‘भारतीय किसान संघ’ का संगठन मंत्री बनाया गया। इस कार्य को उन्होंने दीर्घकाल तक निष्ठापूर्वक किया। श्री दीनदयाल उपाध्याय के प्रति उनके मन में अतिशय श्रद्धा थी। इसलिए जब उनके पैतृक गांव नगला चंद्रभान में उनके जन्मदिवस पर प्रतिवर्ष मेला करने की योजना बनी, तो वे उस प्रकल्प से जुड़ गये। 

आज तो उस मेले का स्वरूप बहुत व्यापक हो गया है। उसमें स्वस्थ पशु, स्वस्थ बालक जैसी प्रतियोगिताओं के साथ ही किसान सम्मेलन, कवि सम्मेलन, कुश्ती और रसिया दंगल जैसे समाजोपयोगी कार्यक्रम होते हैं। उस गांव को केन्द्र बनाकर ग्राम्य विकास के अनेक प्रकल्प भी चलाये जा रहे हैं। स्वदेशी तथा गो आधारित उत्पादों का भी वहां निर्माण हो रहा है। इसके पीछे गिरिराज जी की तपस्या सर्वत्र दिखाई देती है।

वृद्धावस्था में कार्य से विश्राम लेकर वे अपने गांव में ही रहने लगे। अपने मधुर व्यवहार के कारण वे पूरे क्षेत्र के ‘ताऊ जी’ बन गये। छोटे भाई जगनप्रसाद की असमय मृत्यु से उनके मस्तिष्क पर तीव्र आघात हुआ। 21 मई, 2008 को 84 वर्ष की आयु में उनका जीवन दीप भी सदा के लिए भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में विसर्जित हो गया।
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22 मई/बलिदान-दिवस

अमर बलिदानी मुरारबाजी

पांच जनवरी, 1665 को सूर्यग्रहण के अवसर पर शिवाजी महाराज ने माता जीजाबाई के साथ महाबलेश्वर मन्दिर में पूजा की। फिर वे दक्षिण के विजय अभियान पर निकल गये। तभी उन्हें सूचना मिली कि मिर्जा राजा जयसिंह और दिलेर खाँ पूना में पुरन्दर किले की ओर बढ़ रहे हैं। शिवाजी दक्षिण अभियान को स्थगित करना नहीं चाहते थे; पर इन्हें रोकना भी आवश्यक था।

कुछ ही समय में मुगल सेना ने पुरन्दर किले को घेर लिया। वह निकटवर्ती गाँवों में लूटपाट कर आतंक फैलाने लगी। इससे शिवाजी ने मुगलों की चाकरी कर रहे मिर्जा राजा जयसिंह को एक लम्बा पत्र लिखा, जो अब एक ऐतिहासिक विरासत है; पर जयसिंह पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। उल्टे पुरन्दर किले पर हमले और तेज हो गये। 

पुरन्दर किला दो चोटियों पर बना था। मुख्य किला 2,500 फुट ऊँची चोटी पर था, जबकि 2,100 फुट वाली चोटी पर वज्रगढ़ बना था। जब कई दिन के बाद भी मुगलों को किले को हथियाने में सफलता नहीं मिली, तो उन्होंने वज्रगढ़ की ओर से तोपें चढ़ानी प्रारम्भ कर दीं। मराठा वीरों ने कई बार उन्हें पीछे धकेला; पर अन्ततः मुगल वहाँ तोप चढ़ाने में सफल हो गये। इस युद्ध में हजारों मराठा सैनिक मारे गये। 

पुरन्दर किले में मराठा सेना का नेतृत्व मुरारबाजी देशपाण्डे कर रहे थे। उनके पास 6,000 सैनिक थे, जबकि मुगल सेना 10,000 की संख्या में थी और फिर उनके पास तोपें भी थीं। किले पर सामने से दिलेर खाँ ने, तो पीछे से राजा जयसिंह के बेटे कीरत सिंह ने हमला बोल दिया। इससे मुरारबाजी दो पाटों के बीच संकट में फँस गये।  

उनके अधिकांश सैनिक मारे जा चुके थे। शिवाजी ने समाचार पाते ही नेताजी पालकर को किले में गोला-बारूद पहुँचाने को कहा। उन्होंने पिछले भाग में हल्ला बोलकर इस काम में सफलता पाई; पर वे स्वयं किले में नहीं पहुँच सके। इससे किले पर दबाव तो कुछ कम हुआ; पर किला अब भी पूरी तरह असुरक्षित था।

किले के मराठा सैनिकों को अब आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी। मुरारबाजी को भी कुछ सूझ नहीं रहा था। अन्ततः उन्होंने आत्माहुति का मार्ग अपनाते हुए निर्णायक युद्ध लड़ने का निर्णय लिया। किले का मुख्य द्वार खोल दिया गया। बचे हुए 700 सैनिक हाथ में तलवार लेकर मुगलों पर टूट पड़े। इस आत्मबलिदानी दल का नेतृत्व स्वयं मुरारबाजी कर रहे थे। उनके पीछे 200 घुड़सवार सैनिक भी थे। भयानक मारकाट प्रारम्भ हो गयी।

मुरारबाजी मुगलों को काटते हुए सेना के बीच तक पहुँच गये। उनकी आँखें दिलेर खाँ को तलाश रही थीं। वे उसे मारना चाहते थे; पर वह सेना के पिछले भाग में हाथी पर एक हौदे में बैठा था। मुरारबाजी ने एक मुगल घुड़सवार का घोड़ा छीना और उस पर सवार होकर दिलेर खाँ की ओर बढ़ गये। दिलेर खाँ ने यह देखकर एक तीर चलाया, जो मुरारबाजी के सीने में लगा। इसके बाद भी उन्होंने आगे बढ़कर दिलेर खाँ की ओर अपना भाला फेंककर मारा। तब तक एक और तीर ने उनकी गर्दन को बींध दिया। वे घोड़े से निर्जीव होकर गिर पड़े।
यह ऐतिहासिक युद्ध 22 मई, 1665 को हुआ था। मुरारबाजी ने जीवित रहते मुगलों को किले में घुसने नहीं दिया। ऐसे वीरों के बल पर ही छत्रपति शिवाजी ‘हिन्दू पद पादशाही’ की स्थापना कर सके।
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22 मई/जन्म-दिवस

समाज सुधारक राजा राममोहन राय

हिन्दू समाज में सीता, सावित्री, अनसूया आदि सती-साध्वी स्त्रियों की सदा से पूजा होती रही है। सती का अर्थ है मन, वचन, कर्म से अपने पतिव्रत को समर्पित नारी; पर जब भारत में विदेशी और विधर्मियों के आक्रमण होने लगे, तो मुख्यतः राजस्थान में क्षत्रिय वीरांगनाओं ने पराजय की स्थिति में शत्रुओं के हाथों में पड़ने की बजाय आत्मदाह कर प्राण देने का मार्ग चुना। 

इसके लिए वे एक बड़ी चिता सजाकर सामूहिक रूप से उसमें बैठ जाती थीं। वीर पुरुष भी पीछे नहीं रहते थे। वे सब केसरिया वस्त्र पहनकर, किले के फाटक खोलकर रणभूमि में चले जाते थे। इस प्रथा को ही ‘जौहर’ कहा गया। कुछ नारियाँ अपने वीरगति प्राप्त पति के शव के साथ चिता पर बैठ जाती थीं। इसके लिए भी ‘सती’ शब्द ही रूढ़ हो गया।

कुछ और समय बीतने के बाद देश के अनेक भागों (विशेषकर पूर्वांचल) में सती प्रथा का रूप विकृत हो गया। अब हर विधवा अपने पति के शव के साथ चिता पर चढ़ने लगी। कहीं-कहीं तो उसे चिता पर जबरन चढ़ा दिया जाता था। चिता जलने पर ढोल-नगाड़े बजते। सती माता की जय के नारे लगते। इस शोर में उस महिला का रुदन दब जाता। लोग इस कुप्रथा को ही ‘सती प्रथा’ कहकर सम्मानित करने लगे। कई बार तो नाते-रिश्तेदार पारिवारिक सम्पत्ति के लालच में भी महिला को चिता पर चढ़ा देते थे।

ऐसे वातावरण में राधानगर (बंगाल) के एक सम्भ्रात और प्रतिष्ठित परिवार में 22 मई, 1772 को एक बालक जन्मा, जो आगे चलकर नारी अधिकारों के समर्थक और सती प्रथा को समाप्त कराने वाले राजा राममोहन राय के रूप में प्रसिद्ध हुआ। राजा राममोहन राय के बड़े भाई जब बीमार हुए, तो उनका ठीक से इलाज नहीं हुआ। उनके देहान्त के बाद जब पूरा परिवार शोक में डूबा था, तब अनेक लोग उनकी भाभी को सती होने के लिए उकसाने लगे।

उनकी भाभी सती होना नहीं चाहती थीं; पर लोगों ने इसे धर्म और समाज की परम्परा बताते हुए कहा कि सती होकर तुम अपने पति की सर्वप्रियता सिद्ध करोगी। इससे उनका और तुम्हारा दोनों का परलोक सुधरेगा। राजा राममोहन राय राधानगर की जमींदारी के प्रमुख थे। उन्होंने इसका विरोध कर अपनी भाभी को बचाना चाहा; पर लोग इस परम्परा को तोड़ने के पक्षधर नहीं थे। अन्ततः इच्छा न होते हुए भी उनकी भाभी को चिता पर चढ़ना ही पड़ा। राममोहन के कोमल मन को इस घटना ने विचलित कर दिया।

इसके बाद तो उन्होंने इस कुप्रथा की समाप्ति को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन दिनों भारत में अंग्रेजी शासन था। जब गवर्नर जनरल विलियम बैण्टिक ने ‘समाज सुधार योजना’ के अन्तर्गत सती प्रथा की समाप्ति और विधवा विवाह, अन्तरजातीय विवाह आदि के प्रयास किये, तो राजा राममोहन राय ने उनका साथ दिया। 1829 में सती प्रथा विरोधी कानून पारित हो गया।

इसके बाद उन्होंने नारी शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए अनेक विद्यालयों की स्थापना की, जिनमें प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक का प्रबन्ध था। इनमें संस्कृत तथा बांग्ला के साथ अंग्रेजी भी पढ़ाई जाती थी। महिलाओं के अधिकारों के लिए उन्होंने उनके माता-पिता और सास-ससुर को भी प्रेरित किया। उन दिनों बंगाल के बुद्धिजीवी हिन्दू धर्म को हेय समझ कर ईसाइयत की ओर आकर्षित हो रहे थे। यह देखकर वे श्री देवेन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित आध्यात्मिक संस्था ‘ब्रह्म समाज’ में सक्रिय हो गये और इस अन्धी दौड़ को रोका। 

27 सितम्बर, 1833 को जनता को जनार्दन मानकर उसकी आराधना करने वाले राजा राममोहन राय का देहान्त हुआ। यद्यपि कुछ लोगों का मत है कि उन्होंने विधवा दहन को ‘सती प्रथा’ कहकर भारत की बदनामी कराई।
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23 मई/इतिहास-स्मृति

कालपी का संघर्ष 

1857 का स्वाधीनता संग्राम देश के अधिकांश भागों में लड़ा गया था; पर दुर्भाग्यवश यह सफल नहीं हो सका। इसके संचालन का मुख्य केन्द्र उत्तर प्रदेश में कालपी नगर था। वहाँ यमुना नदी की ऊँची कगार पर बने दुर्ग में इस क्रान्ति का नियन्त्रण कक्ष था। दुर्ग के एक भूमिगत कक्ष में हथियार बनाये जाते थे। क्रान्तिवीरों का कोषागार भी यहीं था। नानासाहब से मन्त्रणा के लिए रानी लक्ष्मीबाई, कुँवरसिंह तथा अन्य लोग यहाँ आते रहते थे। 

उन दिनों तात्याटोपे नानासाहब के सेनापति थे। उन्होंने बुन्देलखंड के सब राजे-रजवाड़ों को पत्र भेजकर अपनी सेनाएँ कालपी भेजने का आग्रह किया। पत्र में लिखा था कि इस संघर्ष का उद्देश्य किसी को गद्दी पर बैठाना नहीं अपितु विभिन्न राजाओं के क्षेत्र को अंग्रेजों से बचाना है। बाबा देवगिरी को यह पत्र लेकर सब जगह भेजा गया। 

धीरे-धीरे सेनाएँ एकत्र होने लगीं। जालौन के तहसीलदार नारायण राव ने कार्यालय तथा मुहम्मद इशहाक ने भोजन आदि की व्यवस्था सँभाली। नाना साहब के भाई बालासाहब तथा भतीजे राव साहब भी आ गये। सबने यमुना का जल हाथ में लेकर अन्तिम साँस तक संघर्ष करने का संकल्प लिया।

दुर्ग में तोपों की ढलाई होने लगी। जालौन ने आये कसगरों ने स्थानीय शोरा, कोयला तथा मिर्जापुर से प्राप्त गन्धक से बारूद और बम बनाये। जिले में अंग्रेजों का प्रवेश रोकने के लिए यमुना में चलने वाली 200 नौकाओं का नियन्त्रण क्रान्तिकारियों ने अपने हाथ में ले लिया। अब वहाँ 10,000 सैनिक तथा 12 तोपें युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार थीं। कालपी के लोग इन्हें बहुत मानते थे। वे स्वेच्छा से उनका स्वागत-सत्कार करते, उन्हें बैलगाडि़याँ देते तथा डाकियों से अंग्रेजी डाक छीनकर दुर्ग में पहुँचा देते थे।

अपै्रल मास में रानी लक्ष्मीबाई झाँसी में पराजित होकर कालपी आ गयीं। सर ह्यूरोज के नेतृत्व में अंग्रेज सेना उनके पीछे लगी थी। उन्हें रोकने के लिए कोंच में मोर्चा लगाया गया। सात मई, 1858 को वहाँ हुए भीषण संघर्ष में 500 क्रान्तिकारी बलिदान हुए। इसके बाद सब लौटकर फिर कालपी आ गये। नाना साहब ने अब निर्णायक संघर्ष की तैयारी प्रारम्भ कर दी।

क्रांतिकारियों ने 84 गुम्बज नामक भवन से यमुना तक खाइयाँ खोदकर सब मार्ग काट दिये। यमुना के इधर क्रान्तिकारी तो दूसरी ओर गुलौली में अंग्रेज तैयार थे। ह्यूरोज ने 22 मई को 20 घण्टे तक लगातार दुर्ग पर गोले बरसाये। क्रान्तिकारियों की तैयारी कम थी, पर हिम्मत नहीं। भारी संघर्ष के बाद 23 मई, 1858 की प्रातः ब्रिटिश सेना कालपी में घुस गयी। 

युद्ध में बड़ी संख्या में क्रान्तिवीर बलिदान हुए। यमुना की धारा रक्त से लाल हो गयी। दुर्ग में अंगे्रजों को नानासाहब और लक्ष्मीबाई का महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार, छह हाथी, तोप, गोले, 500 बैरल बारूद, ब्रासगन, मोर्टार, ब्रास पाउडर गन, 9,000 कारतूस तथा भारी मात्रा में पारम्परिक शस्त्र मिले।

अंग्रेजों की इच्छा महत्वपूर्ण नेताओं को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने की थी; पर दुर्ग में बने गुप्त मार्गों से नानासाहब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई आदि सुरक्षित निकल गये। आज भी यह दुर्ग जर्जर अवस्था में उस युद्ध की याद दिलाता है। दुर्ग की दीवारें नौ फुट मोटी तथा छत गुम्बद आकार में है। तोपों की मार से इसका अधिकांश भाग ढह गया था; पर केन्द्रीय कक्ष, किला घाट, मन्दिर तथा यमुना तक जाने वाली सीढि़याँ अभी बाकी हैं।
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23 मई/बलिदान-दिवस

डा.चम्पक रमण पिल्लई का बलिदान

प्रायः उच्च शिक्षा पाकर लोग धन कमाने में लग जाते हैं; पर स्वाधीनता से पूर्व अनेक युवकों ने देश ही नहीं, तो विदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से उच्च उपाधियां पाकर भी देशसेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। डा. चंपकरमण पिल्लई ऐसे ही एक अमर बलिदानी थे।

डा. पिल्लई का जन्म 15 सितम्बर 1881 को त्रिवेन्द्रम (केरल) में हुआ था। प्रारम्भ में उनकी रुचि अध्ययन की बजाय खेल में अधिक थी; पर कुछ विद्वानों के सहयोग से वे इटली चले गये। वहां उन्होंने 12 भाषाओं में निपुणता प्राप्त की। इसके बाद उनकी उच्च शिक्षा की भूख बढ़ती गयी और वे फ्रांस, स्विटजरलैंड और जर्मनी जाकर अध्ययन करने लगेे। बर्लिन विश्वविद्यालय से उन्होंने अर्थशास्त्र और अभियन्ता विषय में पी-एच.डी की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद वे बर्लिन में ही अभियन्ता की नौकरी करने लगे।

पर इस समय तक उनका सम्पर्क भारत की स्वतंत्रता के लिए विदेशों में काम कर रहे लोगों तथा गदर पार्टी से हो चुका था। उनसे प्रभावित होकर डा. पिल्लई भी इस अभियान में लग गये। 11 नवम्बर, 1914 को एक जंगी जहाज के सहायक कप्तान के रूप में वे बंगाल की खाड़ी में आये। वे अंदमान जेल से सावरकर जी को छुड़ाना चाहते थे; पर वे जिस छोटी पनडुब्बी से अंदमान जा रहे थे, उसे अंग्रेजों ने नष्ट कर दिया। इससे उनकी योजना असफल हो गयी। इसके बाद भी उनके साहस व बुद्धिमत्ता से घबराकर अंग्रेजों ने उनकी गिरफ्तारी के लिए कई लाख रुपये का पुरस्कार घोषित कर दिया।

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर डा. पिल्लई अफ्रीका गये, वहां उनकी भेंट गांधी जी से हुई। वस्तुतः डा. पिल्लई विदेश आने वाले भारत के सभी प्रभावी लोगों से भेंट कर उन्हें समझाते थे कि अंग्रेजों को हटाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास होने चाहिए। इसके लिए यदि दुनिया के कुछ देश सहयोग करना चाहते हैं, तो हमें उनसे सहयोग लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। 

उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुई ‘वारसा संधि’ का प्रखर विरोध किया, चूंकि उसमें भारत की स्वतंत्रता की कोई बात नहीं थी। उन्होंने इस युद्ध में अंग्रेजों का विरोध किया था, इस कारण जर्मनी सरकार उन्हें सम्मानित करना चाहती थी; पर डा. पिल्लई ने इस विदेशी सम्मान को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि मैंने यह सब भारत की स्वाधीनता के लिए किया है।

1924 में उनकी भेंट सरदार पटेल व नेहरु जी से भी हुई। उन्हें भी डा. पिल्लई ने बर्मा के मार्ग से ब्रिटिश शासन पर आक्रमण करने की अपनी योजना समझाई; पर वे दोनों इससे सहमत नहीं हुए। यों तो डा. पिल्लई के हिटलर से अच्छे सम्बन्ध थे; पर जब उन्हें पता लगा कि हिटलर के नाजी साथियों ने जर्मनी में गदर पार्टी की सम्पत्ति जब्त कर ली है, तो उन्होंने जर्मनी लौटकर इसका प्रतिरोध किया। इस पर उनकी नाजियों से सीधी झड़प हो गयी। नाजियों ने उन्हें बुरी तरह पीटा। इससे उन्हें कुछ ऐसी चोट लगी कि 42 वर्ष की अल्पायु में 23 मई, 1934 को उनका देहांत हो गया।

डा. पिल्लई की इच्छा थी भारत स्वाधीन होने के बाद उनकी अस्थियों को नौसैनिक पोत से उनके नगर में ले जाकर प्रवाहित किया जाए। उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई ने 32 वर्ष तक इस कामना को संजोकर रखा। 17 सितम्बर, 1966 को उस दिवंगत वीर की यह इच्छा पूरी हुई, जब श्रीमती लक्ष्मीबाई ने नौसेना अध्यक्ष एडमिरल नंदा को वे अस्थियां सौंपी, जिन्हें पूरे विधि-विधान के साथ त्रिवेन्द्रम के पास समुद्र में विसर्जित कर दिया गया।

(संदर्भ : मातृवंदना, क्रांतिवीर नमन अंक, मार्च-अपै्रल 2008)
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23 मई    जन्म-दिवस
 

बहुआयामी प्रतिभा के धनी सूर्यकृष्ण जी
 

प्रायः लोग किसी एक काम के विशेषज्ञ होते हैं; पर सूर्यकृष्ण जी ने कई कामों में अपनी विशेषज्ञता सिद्ध कर दिखायी। उनका जन्म 23 मई, 1934 को मिंटगुमरी (पाकिस्तान) में सिंचाई विभाग में ओवरसियर श्री इंद्रनारायण जी एवं श्रीमती विद्यावती जी के घर में हुआ था। 

उन्होंने ओकारा (पाकिस्तान) से माध्यमिक शिक्षा, नीलोखेड़ी (हरियाणा) से विद्युत विभाग में डिप्लोमा तथा पंजाब वि.वि. से ‘प्रभाकर’ की उपाधि प्राप्त की। छह वर्ष की अवस्था से ही वे मिंटगुमरी में अपने बड़े भाई के साथ शाखा जाने लगे थे। विभाजन के बाद उनका परिवार उ.प्र. के सहारनपुर में आ गया। 1954 से 1960 तक सूर्यकृष्ण जी सहारनपुर में ही प्रचारक रहे। फिर वे एटा, बिजनौर, देहरादून आदि में भी रहे।
 

आपातकाल में वे देहरादून में विभाग प्रचारक थे। आपातकाल के बाद ‘जनता पार्टी’ की सरकार बनने पर सूर्यकृष्ण जी उसकी उ.प्र. इकाई के महामंत्री बने। जनता पार्टी टूटने पर बनी भारतीय जनता पार्टी की उ.प्र. इकाई के भी वे 1984 तक महामंत्री रहे। फिर वे हरियाणा में भा.ज.पा. के संगठन मंत्री बनाये गये। उस दौरान भा.ज.पा. को चुनाव में अभूतपूर्व सफलता मिली। 1987 में उन्हें विश्व हिन्दू परिषद में प्रचार, संपर्क और समन्वय का काम दिया गया।
 

उन दिनों श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन जोरों पर था। सूर्यकृष्ण जी ने इतिहास, गजेटियर तथा राजस्व अभिलेखों को व्यस्थित कर 1991 में हुई सरकारी वार्ताओं में भाग लिया। आंकड़े और अभिलेख उनके दिमाग में ऐसे बसे थे कि लोग उन्हें जीवंत अभिलेखागार कहते थे। फिर उन्होंने मंदिर का नक्शा और उसका लकड़ी का प्रारूप बनवाकर जनता और संतों के बीच रखा। राजस्थान जाकर मंदिर के लिए पत्थर तलाशा। उसकी मजबूती की जांच केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्था (सी.बी.आर.आई), रुड़की में करायी। फिर अयोध्या में मंदिर के शिलान्यास के लिए निर्विवाद स्थान को चुनकर पूरे कार्यक्रम को सम्पन्न कराया। 

बाबरी ढांचे के ध्वंस के बाद शासन ने संघ तथा वि.हि.प. पर प्रतिबंध लगा दिया। ध्वंस की जांच के लिए एक आयोग भी बना; पर सूर्यकृष्ण जी ने इन दोनों मामलों को इतने अच्छे ढंग से संभाला कि शासन को प्रतिबंध हटाना पड़ा।
 

सूर्यकृष्ण जी हर काम बड़ी गहराई से करते थे। 1994 में वे ‘अ.भा.साहित्य परिषद’ तथा 1998 में ‘अ.भा.अधिवक्ता परिषद’ के संगठन मंत्री बनाये गये। वे न लेखक थे और न वकील; पर उन्होंने देश भर में घूम कर साहित्यकारों को जोड़ा। साहित्य से वामपंथी खेमे को बाहर करने के लिए उन्होंने नये लेखकों को प्रेरणा दी कि वे अपने लेखन की दिशा शुरू से ही देश, धर्म और समाज के हित में रखें। 

उन्होंने वकीलों को संगठित कर हिन्दुत्व सम्बन्धी कई विषयों को कानूनी स्तर पर सुलझाने में भागीदारी की। इनमें संघ पर लगे प्रतिबंध, लिब्राहन आयोग तथा रामसेतु विवाद मुख्य हैं। उन्होंने वकीलों से विधि प्रणाली को सरल, सस्ता तथा सर्वसुलभ बनाने के लिए काम करने का आग्रह किया। 
 

सूर्यकृष्ण जी की निर्माण कार्य में भी बड़ी रुचि थी। वि.हि.प. का केन्द्रीय कार्यालय (संकटमोचन आश्रम) उन्होंने स्वयं खड़े होकर बनवाया। वे दिल्ली के सुप्रसिद्ध श्री बद्रीभगत मंदिर समिति, झंडेवाला के न्यासी थे। इसकी ओर से गाजियाबाद जिले के ग्राम बेहटा हाजीपुर तथा दिल्ली के मंडोली ग्राम में बने देवी मंदिर एवं वेद विद्यालयों के भवन भी उनकी देखरेख में ही बने।
 

वृद्धावस्था, मधुमेह तथा रक्तचाप आदि रोगों के कारण पिछले कई साल से उन्होंने सब कामों से मुक्ति ले ली थी। उनके हृदय की बाइपास सर्जरी हो चुकी थी। 13 मार्च, 2016 को दिल्ली में संघ कार्यालय, झंडेवाला पर हुए भीषण हृदयाघात से उनका निधन हुआ। वे अपनी देहदान का संकल्प पत्र भर चुके थे। अतः ‘दधीचि देहदान समिति’ के माध्यम से उनके नेत्र तथा फिर पूरी देह छात्रों के प्रशिक्षण के लिए सफदरजंग चिकित्सालय को दे दी गयी।
 

(संदर्भ : श्रद्धांजलि सभा में वितरित पत्रक/चंपत जी, वि.हि.प)

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