संगत के सेवादार सरदार चिरंजीव सिंह
पंजाब भारत की खड्गधारी भुजा है। पंजाबियों ने सर्वत्र अपनी योग्यता और पौरुष का लोहा मनवाया है; पर एक समय ऐसा भी आया, जब कुछ सिख समूह अलग खालिस्तान का राग गाने लगे। इस माहौल को संभालने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ का गठन कर इसकी जिम्मेदारी वरिष्ठ प्रचारक श्री चिरंजीव सिंह को दी।
चिरंजीव जी का जन्म एक अक्तूबर, 1930 (आश्विन शु. 9) को पटियाला में एक किसान श्री हरकरण दास (तरलोचन सिंह) तथा श्रीमती द्वारकी देवी (जोगेन्दर कौर) के घर में हुआ। मां सरकारी विद्यालय में पढ़ाती थीं। उनसे पहले दो भाई और भी थे; पर वे बचे नहीं। मंदिर और गुरुद्वारों में पूजा के बाद जन्मे इस बालक का नाम मां ने चिरंजीव रखा। 1952 में उन्होंने राजकीय विद्यालय, पटियाला से बी.ए. किया। वे बचपन से ही सब धर्म और पंथों के संतों के पास बैठते थे।
1944 में कक्षा सात में पढ़ते समय वे अपने मित्र रवि के साथ पहली बार शाखा गये। वहां के खेल, अनुशासन, प्रार्थना और नाम के साथ ‘जी’ लगाने से वे बहुत प्रभावित हुए। शाखा में वे अकेले सिख थे। 1946 में वे प्राथमिक वर्ग और फिर 1947, 50 और 52 में तीनों वर्ष के संघ शिक्षा वर्गों में गये। 1946 में गीता विद्यालय, कुरुक्षेत्र की स्थापना पर सरसंघचालक श्री गुरुजी के भाषण ने उनके मन पर अमिट छाप छोड़ी। गला अच्छा होने के कारण वे गीत कविता आदि खूब बोलते थे। श्री गुरुजी को ये सब बहुत अच्छा लगता था। अतः उनका प्रेम चिरंजीव जी को खूब मिला।
1948 के प्रतिबंध काल में वे सत्याग्रह कर दो मास जेल में रहे। बी.ए. के बाद वे अध्यापक बनना चाहते थे; पर विभाग प्रचारक बाबू श्रीचंद जी के आग्रह पर 1953 में वे प्रचारक बन गये। वे मलेर कोटला, संगरूर, पटियाला, रोपड़, लुधियाना में तहसील, जिला, विभाग व सह संभाग प्रचारक रहे। लुधियाना 21 वर्ष तक उनका केन्द्र रहा। संघ शिक्षा वर्ग में वे 20 वर्ष शिक्षक और चार बार मुख्य शिक्षक रहे। 1984 में उन्हें विश्व हिन्दू परिषद, पंजाब का संगठन मंत्री बनाया गया। इस दायित्व पर वे 1990 तक रहे।
इससे पूर्व ‘पंजाब कल्याण फोरम’ बनाकर सभी पंजाबियों में प्रेम बनाये रखने के प्रयास किये जा रहे थे। 1982 में अमृतसर में एक धर्म सम्मेलन भी हुआ। 1987 में स्वामी वामदेव जी व स्वामी सत्यमित्रानंद जी के नेतृत्व में 600 संतों ने हरिद्वार से अमृतसर तक यात्रा की और अकाल तख्त के जत्थेदार दर्शन सिंह जी से मिलकर एकता का संदेश गंुजाया। अक्तूबर 1986 में दिल्ली में एक बैठक हुई। उसमें गहन चिंतन के बाद गुरु नानकदेव जी के प्रकाश पर्व (24 नवम्बर, 1986) पर अमृतसर में ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ का गठन हो गया। सरदार शमशेर सिंह गिल इसके अध्यक्ष तथा चिरंजीव जी महासचिव बनाये गये। 1990 में शमशेर जी के निधन के बाद चिरंजीव जी इसके अध्यक्ष बने।
चिरंजीव जी ने संगत के काम के लिए देश के साथ ही इंग्लैड, कनाडा, जर्मनी, अमरीका आदि में प्रवास किया। उनके कार्यक्रम में हिन्दू और सिख दोनों आते थे। उन्होंने दोनों को एक परिवार का अंग बताते हुए कहा कि खालिस्तान आंदोलन को अधिक समर्थन नहीं है; पर भयवश लोग चुप रहते हैं। 1999 में ‘खालसा सिरजना यात्रा’ पटना में सम्पन्न हुई। वर्ष 2000 में न्यूयार्क के ‘विश्व धर्म सम्मेलन’ में वे 108 संतों के साथ गये, जिनमें आनंदपुर साहिब के जत्थेदार भी थे। ऐसे कार्यक्रमों से संगत का काम विश्व भर में फैल गया। इसे वैचारिक आधार देने में पांचवे सरसंघचालक सुदर्शन जी का भी बड़ा योगदान रहा।
वर्ष 2003 में वृद्धावस्था के कारण उन्होंने अध्यक्ष पद छोड़ दिया तथा दिल्ली में पहाड़गंज स्थित संगत के कार्यालय में रहने लगे। वहां कार्यकर्ता उनसे मिलने आते रहते थे। 20 नवम्बर, 2023 को लुधियाना में उनका देहांत हुआ।
(संदर्भ : संगत संसार के सम्पादक राकेश रिखी से प्राप्त जानकारी)
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2 अक्तूबर/जन्म-दिवस
जय जवान जय किसान के प्रणेता लाल बहादुर शास्त्री
भारत के दूसरे प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री को
अपनी सरलता और सादगी के लिए सदा याद किया जाता है। उनका जन्म दो अक्तूबर, 1904 को मुगलसराय
(उ.प्र.) के एक निर्धन परिवार में हुआ था। उनके पिता मुंशी शारदा प्रसाद
श्रीवास्तव प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। उनके निधन के बाद माता श्रीमती
रामदुलारी ने बड़े कष्टों में उनका लालन पालन किया। घर में सबसे छोटे होने के कारण
उन्हें ‘नन्हें’ कहा जाता था।
लाल बहादुर पढ़ने में अच्छे थे; पर स्कूल नदी के
पार था। नाव से जाने पर दो पैसे लगते थे। अतः वे तैरकर वहां जाते थे। मेधावी छात्र
होने के कारण विद्यालय में निरीक्षण के समय उन्हें ही आगे कर दिया जाता था। 23 वर्ष की अवस्था
में उनका विवाह ललिता देवी से हुआ। गांधीवादी होने के कारण उन्होंने दहेज में कुछ
खादी के कपड़े और एक चरखा ही स्वीकार किया।
1930 में एक आंदोलन
के समय कांग्रेस नेता जवाहरलाल नेहरू की मां स्वरूपरानी घायल हो गयीं। शास्त्री जी
ने उन्हें घर पहुंचाया। इससे उनकी निकटता नेहरू जी से हो गयी, जो आजीवन बनी
रही। उन पर कांग्रेस संगठन और फिर सरकार में भी अनेक जिम्मेदारियां रहीं।
स्वाधीनता आंदोलन में वे आठ बार जेल गये और कुल नौ वर्ष वहां बिताए। स्वाधीनता के
बाद वे उ.प्र. में गृहमंत्री और फिर केन्द्र में रेल मंत्री बने। 1956 में अरियालुर
रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र दे दिया था।
नेहरू जी की मृत्यु के बाद नौ जून, 1964 को वे
प्रधानमंत्री बने। 1965 में पाकिस्तान
ने हमला कर दिया। 1962 के युद्ध में
भारत को चीन के हाथों बड़ा क्षेत्र गंवाना पड़ा था। हजारों सैनिक भी मारे गये थे।
इससे देश में निराशा व्याप्त थी; पर पाकिस्तान से युद्ध के समय शास्त्री जी ने तीनों सेना
प्रमुखों को निर्णय लेने की छूट दी। इससे उत्साहित होकर सेना ने शत्रु को धूल चटा
दी। यह उनके साहस एवं कुशल नेतृत्व का प्रमाण है।
शास्त्री जी का कद छोटा था, जबकि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अयूब खां बहुत
लम्बे थे। वे कहते थे कि धोती कुर्ते वाला ये छोटा आदमी क्या लड़ेगा; पर शास्त्री जी
ने उसका अंहकार चूर-चूर कर दिया। उन दिनों अन्न की कमी के कारण हम अमरीका से गेहूं
मंगाते थे। वह पाकिस्तान का पक्षधर था। उसने भारत को अन्न रोकने की धमकी दी।
शास्त्री जी ने देशवासियों से सोमवार रात को उपवास रखने का आह्वान किया। उन्होंने
स्वयं भी ऐसा ही किया। देश में जहां भी खाली जगह थी, वहां अन्न उपजाया जाने लगा। इससे स्थिति सुधरी
तथा ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा सार्थक
हुआ।
1965 के युद्ध में
जीतने के बाद उन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ने लगे। इस कारण उन्हें पाकिस्तान से
वार्ता के लिए सोवियत रूस के ताशकंद नगर में जाना पड़ा। 11 जनवरी, 1966 को वहां हुआ
समझौता उनके स्वाभिमान के विरुद्ध था; पर मजबूरी में उन्हें हस्ताक्षर करने पड़े। इससे उनके दिल
को चोट लगी और रात में हुए भीषण हृदयाघात से उनका देहांत हो गया।
शास्त्री जी की कथनी और करनी एक थी। धैर्य, त्याग, आत्मसम्मान और
प्रामाणिकता उनके जीवन के सूत्र थे। वे नशाबंदी, खादी और हिन्दी को प्रोत्साहन देते थे।
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनके बच्चे तांगे से ही स्कूल जाते थे। एक बार बच्चे
सरकारी कार से स्कूल गये,
तो उन्होंने अपने
वेतन से उसका भुगतान किया। मृत्यु के समय उनके पास न कोई निजी घर था और न ही कोई बैंक
बैलेंस। देश को उनसे बहुत आशाएं थीं; पर वे जल्दी ही चले गये। 1966 में उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया
गया।
(विभिन्न पत्र पत्रिकाएं..)
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कर्मपथ के पथिक जुगल किशोर जैथलिया
राजस्थान में जन्म लेकर कोलकाता को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले श्री जुगल किशोर जैथलिया का जन्म दो अक्तूबर, 1937 को छोटीखाटू (जिला नागौर) में हुआ था। उनके पिता श्री कन्हैया लाल एवं माता श्रीमती पुष्पादेवी थीं। अकेले पुत्र होने के कारण 15 वर्ष में ही उनका विवाह कर दिया गया।
1953 में वे कोलकाता आ गये, जहां उनके पिताजी एक राजस्थानी फर्म में काम करते थे। जुगलजी ने यहां काम के साथ पढ़ाई जारी रखी और कानून और एम.काॅम की उपाधि प्राप्त की। इसी दौरान वे एक वकील के पास बैठने लगे और फिर अलग से आयकर सलाहकार के रूप में काम शुरू कर दिया।
जुगलजी का रुझान साहित्यिक गतिविधियों की ओर विशेष था। कोलकाता आकर भी वे अपनी जन्मभूमि से जुड़े रहे। उन्होंने अपने मित्रों के साथ 1958 में ‘श्री छोटीखाटू हिन्दी पुस्तकालय’ की स्थापना की। यहां पत्र-पत्रिकाओं के अध्ययन के साथ विचार गोष्ठियां भी होती थीं, जिसमें वे सामाजिक, साहित्यिक और राजनीतिक जगत की बड़ी हस्तियों को बुलाते थे।
पुस्तकालय के भवन का उद्घाटन उन्होंने प्रख्यात साहित्यकार वैद्य गुरुदत्त से कराया। इससे उस गांव की पहचान पूरे प्रदेश में हो गयी। इसके बाद ‘पंडित दीनदयाल साहित्य सम्मान’ तथा ‘महाकवि कन्हैयालाल सेठिया मायड़ भाषा सम्मान’ प्रारम्भ किये। कई स्मारिकाएं भी प्रकाशित की गयीं। गांव में टेलीफोन, पेयजल, अस्पताल जैसे लोक कल्याण के कामों में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कोलकाता में राजस्थान परिषद, सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय, बड़ाबाजार लाइब्रेरी आदि के उन्नयन में उनकी भूमिका सदा याद की जाएगी। 1973 में उन्होंने ‘श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय’ का काम संभाला और उसे राष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलाई। इसमें श्री विष्णुकांत शास्त्री का भी विशेष योगदान रहा।
उनके संयोजन में आपातकाल के दौरान हल्दीघाटी चतुःशती समारोह एवं कवि सम्मेलन हुआ। 1994 में अटल बिहारी वाजपेयी का एकल काव्यपाठ तो अद्भुत था। आज अटलजी की जो कविताएं उनके स्वर में उपलब्ध हैं, वे उसी कार्यक्रम की देन हैं। संस्था द्वारा 1986 से ‘स्वामी विवेकानंद सेवा सम्मान’ तथा 1990 से ‘डा. हेडगेवार प्रज्ञा सम्मान’ भी दिया जा रहा है।
जुगलजी स्मारिकाओं के प्रकाशन पर विशेष जोर देते थे। इससे जहां संस्था की आर्थिक स्थिति सुधरती थी, वहां उस विषय पर अधिकृत जानकारी भी पाठकों को उपलब्ध होती थी। गद्य एवं पद्य के कई गं्रथों का सम्पादन उन्होंने स्वयं किया। 65 वर्ष के होने पर उन्होंने वकालत छोड़ दी और पूरा समय सामाजिक कामों में लगाने लगे।
वे कोलकाता की कई संस्थाओं के सदस्य थे। उनके प्रयास से कोलकाता में महाराणा प्रताप की स्मृति में एक पार्क तथा सड़क का नामकरण हुआ तथा एक बड़ी कांस्य प्रतिमा स्थापित हुई। वे भारत सरकार द्वारा संचालित ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ के निदेशक एवं न्यासी भी थे। उनके प्रयास से इस संस्था ने राजस्थानी भाषा में भी पुस्तकें प्रकाशित कीं।
जुगलजी 1946 में अपने गांव में शाखा जाने लगे थे। कोलकाता में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और फिर संघ में सक्रिय रहे। उन पर महानगर बौद्धिक प्रमुख और फिर प्रांत के सह बौद्धिक प्रमुख की जिम्मेदारी रही। 1982 में वे भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर जोड़ाबागान विधानसभा से चुनाव लड़े। वे बंगाल भा.ज.पा. के कोषाध्यक्ष तथा वरिष्ठ उपाध्यक्ष भी रहे।
कोलकाता में बड़ी संख्या में राजस्थानी व्यापारी रहते हैं। अपने मूल स्थानों के अनुसार उनकी संस्थाएं भी हैं। उन्हें एक साथ लाने और संघ से जोड़ने में जुगलजी की भूमिका बड़े महत्व की रही। वे पृष्ठभूमि में रहकर सभी शैक्षिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं का सहयोग करते थे। अनेक सम्मानों से विभूषित जुगल किशोर जैथलिया का एक जून, 2016 को कोलकाता में ही निधन हुआ।
(संदर्भ : पांचजन्य 7.1.18)
3
अक्तूबर/जन्म-दिवस
सिद्धांतवादी राजनेता केदारनाथ साहनी
राजनीतिक कीचड़ में भी अपनी सिद्धांतप्रियता के चलते अलग
पहचान बनाने वाले श्री केदारनाथ साहनी का जन्म तीन अक्तूबर, 1926 को बप्पा रावल
की जन्मभूमि रावलपिंडी में हुआ था। यह क्षेत्र अब पाकिस्तान में है। विभाजन के बाद
विस्थापित होकर उनके परिजन दिल्ली आ गये। फिर तो दिल्ली ही उनके सामाजिक और
राजनीतिक जीवन के केन्द्र में रहा। छात्र जीवन में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
के संपर्क में आये और फिर आजीवन एक समर्पित स्वयंसेवक रहे। 1947 में उन्होंने
प्रचारक जीवन स्वीकार किया।
सर्वप्रथम उन्हें जम्मू कश्मीर के मीरपुर क्षेत्र में भेजा
गया। यह राज्य उन दिनों विभाजन की आशंकाओं से त्रस्त था। लोग समझ नहीं पा रहे थे
कि यह भारत में रहेगा या नहीं ? महाराजा हरिसिंह स्वयं असमंजस में थे। उन दिनों हर ओर मजहबी
दंगे, नरसंहार, बलात्कार और
लूटपाट हो रही थी। मीरपुर की अधिकांश हिन्दू और सिख आबादी भी काट दी गयी। शेष बचे
हिन्दुओं को निकालने में संघ की बड़ी भूमिका रही। केदारनाथ जी भी इस सारे काम की
अग्रणी मंडली में थे। अब मीरपुर पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर में है।
इसके बाद उनका कार्यक्षेत्र दिल्ली के पास गुड़गांव बनाया
गया। 1952 में भारतीय
जनसंघ की स्थापना हुई। उसके विस्तार के लिए संघ की ओर से कुछ समर्पित कार्यकर्ता
दिये गये। केदारनाथ जी भी उनमें से एक थे। 1957 में उन्हें दिल्ली में भारतीय जनसंघ के संगठन मंत्री की
जिम्मेदारी दी गयी। कुछ ही समय में उन्होंने दिल्ली में संगठन का मजबूत आधार खड़ा
कर लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि 1959-60 में वे दिल्ली के महापौर रहे। 1967 में उन्हें
परिषद की स्थायी समिति के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिली।
राजनीति में सक्रियता के बावजूद वे संघ संबंधी कार्य भी
करते रहे। कई वर्ष वे भारत प्रकाशन के मानद महाप्रबंधक रहे। साप्ताहिक पांचजन्य और
आर्गनाइजर इसी संस्था द्वारा प्रकाशित होते हैं। 1972 से 1975 तक वे फिर दिल्ली के महापौर रहे। आपातकाल में पुलिस उनको
तलाशती रही; पर वे पकड़ में
नहीं आये। संघ योजना से इंदिरा सरकार की तानाशाही का भंडाफोड़ करने के लिए जो लोग
विदेश भेजे गये, उनमें केदारनाथ
जी भी थे।
आपातकाल समाप्ति के बाद वे भारत लौटे। अपनी सिद्धांतप्रियता
के चलते वे प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति से दूर रहे। शासन के विभिन्न पदों पर रहते
हुए उन्होंने कभी नियमविरुद्ध काम नहीं किया। जब उनके पास फाइलें आती थीं, तो वे उस पर
नियमानुसार उचित कार्यवाही करने की टिप्पणी लिख देते थे। इस कारण वे कुछ अलोकप्रिय
भी हुए। लोगों ने उनका नाम श्रीमान उचित और श्रीमान नियमानुसार रख दिया था। यद्यपि
उन्हें यह देखकर बहुत कष्ट होता था कि लोग नीचे के अधिकारियों को कुछ ले देकर ऐसे
काम करा लेते थे। वे कहते थे कि भ्रष्ट व्यवस्था में सही काम करने वाले का बने
रहना कठिन है।
आगे चलकर वे सिक्किम और गोवा के राज्यपाल रहे। उस दौरान भी
वे वैभव प्रदर्शन से दूर रहे। अपने कार्यालय या किसी भी कार्यक्रम में वे सदा समय
पर पहुंचते थे। यद्यपि कार्यक्रम देरी से शुरू होने पर उन्हें बहुत कष्ट होता था।
दिल्ली नगर निगम के पूर्व सदस्य के नाते मिलने वाली पेंशन वे नहीं लेते थे। दिल्ली
में श्री भोलानाथ विज ने ‘चौपाल’ नामक संस्था बनाई। यह निर्धन परिवारों को आर्थिक सहयोग देती
थी, जिससे वे अपना
कुछ काम खड़ा कर सकें। केदारनाथ जी इसके संरक्षक बने। कश्मीर घाटी से विस्थापित
हिन्दुओं की सहायता के लिए भी वे सदा उपलब्ध रहते थे।
सादगी और सरलता के धनी केदारनाथ जी ने तीन अक्तूबर, 2012 को दिल्ली में
ही अंतिम सांस ली। उनके नाम पर दिल्ली शासन ने एक सभागार बनाया है।
(विकी/पांचजन्य 14.10.2012/7, देवेन्द्र
स्वरूप..आदि)
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जब वे 11 वर्ष के थे, तो उनकी मां श्रीमती राधाबाई का और अगले वर्ष पिताजी का निधन हो गया। अतः सब भाई-बहिन अपनी बुआ के पास मुंबई आ गये। मुंबई के प्रथम प्रचारक श्री गोपालराव येरकुंटवार के माध्यम से वे 1935 में शिवाजी उद्यान शाखा में जाने लगे। डा. हेडगेवार के मुंबई आने पर वे प्रायः उनकी सेवा में रहते थे। 1940 में उन्होंने तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण लिया। वहां पूज्य डा. जी ने अपना अंतिम बौद्धिक दिया था। इससे उनके जीवन की दिशा निर्धारित हो गयी। मुंबई में वे दादर विभाग के कार्यवाह थे।
1945 में वकालत उत्तीर्ण कर वे प्रचारक बने और उन्हें केरल में कोच्चि भेजा गया। अलग प्रांत बनने पर वे केरल के प्रथम प्रांत प्रचारक बने। तब से 1982 तक वही उनका कार्यक्षेत्र रहा। वे वहां की भाषा, भोजन, वेष और नाम (के.भास्करन्) अपनाकर पूर्णतः समरस हो गये। उन दिनों वहां हिन्दुओं का भारी उत्पीड़न होता था। यदि हिन्दू दुकान पर बैठकर चाय पी रहा हो और ईसाई या मुसलमान आ जाए, तो उसे खड़े होना पड़ता था। ऊपर लपेटी हुई लुंगी भी नीचे करनी पड़ती थी। शासन पूरी तरह हिन्दू विरोधी था ही। 1951 में ईसाइयों ने केरल में 105 मंदिर तोड़े थे। ऐसे माहौल में काम करना सरल न था।
पर भास्कर राव जुझारू प्रकृति के थे। उन्होंने मछुआरों में रात्रि शाखाएं शुरू कीं। इससे हिन्दू ईंट का जवाब पत्थर से देने लगे। शुक्रवार को विद्यालयों में नमाज की छुट्टी होती थी। उन्होंने इस समय में विद्यालय शाखाओं का विस्तार किया। मछली के कारोबार में मुसलमान प्रभावी थे। वे शुक्रवार को छुट्टी रखते थे। इससे हिन्दुओं को भारी हानि होती थी। भास्करराव ने ‘मत्स्य प्रवर्तक संघ’ बनाकर इस एकाधिकार को तोड़ा।
उन दिनों कम्यूनिस्ट भी शाखा पर हमले करते थे। स्वयंसेवकों ने उन्हंे उसी शैली में जवाब दिया। कई स्वयंसेवक मारे गये, कई को लम्बी सजाएं हुईं; पर भास्कर राव डटे रहे। एक बार तो कम्युनिस्टों को सत्ता से हटाने के लिए उन्होंने कांग्रेस का साथ दिया। सरकार बनने पर कांग्रेस नेता व्यालार रवि ने संघ कार्यालय आकर उन्हें धन्यवाद दिया।
उन्होंने शहरों या पैसे वालों की बजाय मछुआरे, भूमिहीन किसान, मजदूर, छोटे कारीगर, अनुसूचित जाति व जनजाति के बीच काम बढ़ाया। इससे हजारों संघर्षशील कार्यकर्ता निर्माण हुए। इसके बाद उन्होंने जनसंघ, विद्यार्थी परिषद, मजदूर संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बाल गोकुलम्, मंदिर संरक्षण समिति जैसे कामों के लिए भी कार्यकर्ता उपलब्ध कराये। छुआछूत के माहौल में उनके प्रयास से गुरुवायूर मंदिर में सबका प्रवेश संभव हुआ। उन्होंने कामकोटि के शंकराचार्य जी की अनुमति से सभी वर्गों के लिए पुजारी प्रशिक्षण शुरू किया।
1981 में हृदयाघात तथा 1983 में बाइपास सर्जरी के बाद 1984 में उन्हें ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के अ.भा.संगठन मंत्री का कार्य दिया गया। उन्होंने सबसे कहा कि ईसाइयों की तरह वनवासियों की गरीबी और अशिक्षा का ढिंढोरा बंद कर उनके गौरवशाली इतिहास और परम्पराओं को सामने लाएं। इससे वनवासियों का स्वाभिमान जागा और उनमें से ही सैकड़ों प्रचारक एवं पूर्णकालिक कार्यकर्ता बने। खेल प्रतियोगिता से भी हजारों जनजातीय युवक व युवतियां काम में जुड़े। जबलपुर में उन्होंने ‘वनस्वर अकादमी’ की स्थापना की।
भास्करराव 14 भाषाएं जानते थे। 1996 में कैंसरग्रस्त हो जाने से उन्होंने सब दायित्वों से मुक्ति ले ली। मुंबई में चिकित्सा के दौरान जब उन्हें लगा कि अब ठीक होना संभव नहीं है, तो वे आग्रहपूर्वक अपने पहले कार्यक्षेत्र कोच्चि में आ गये। 12 जनवरी, 2002 को कोच्चि के संघ कार्यालय पर ही उन्होंने संतोषपूर्वक अंतिम सांस ली।
(संदर्भ : हमारे महान वन नायक)
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5 अक्तूबर/जन्म-दिवस
तपस्वी राजनीतिज्ञ कैलाशपति मिश्र
राजनीति को प्रायः उठापटक और जिन्दाबाद-मुर्दाबाद वाला क्षेत्र माना जाता है; पर संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री कैलाशपति मिश्र ने यहां रहकर अपने आदर्श आचरण से समर्थक ही नहीं, तो घोर विरोधियों तक को प्रभावित किया। बिहार और झारखंड में उन्होंने जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। सबसे वरिष्ठ होने के कारण वे ‘भीष्म पितामह’ माने जाते थे।
श्री कैलाशपति मिश्र का जन्म पांच अक्तूबर, 1923 को बिहार के बक्सर जिले में स्थित ग्राम दुधारचक में श्री हजारीप्रसाद मिश्र के घर में हुआ था। इस परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी; लेकिन कैलाशपति जी की रुचि पढ़ने में बहुत थी। 1942 में वे कक्षा दस के छात्र थे। उन दिनों देश भर में ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन का जोर था। श्री कैलाशपति मिश्र ने भी उस आंदोलन में सहभाग करते हुए जेल की यात्रा की।
जेल से आकर वे फिर पढ़ाई में लग गये। 1945 में उनका सम्पर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ और फिर वही उनके जीवन का ध्येय बन गया। उन्होंने अविवाहित रहकर संघ के माध्यम से देशसेवा का व्रत ले लिया। शिक्षा पूर्ण कर उनके प्रचारक जीवन की यात्रा 1947 में प्रारम्भ हुई। क्रमशः आरा, पटना और पूर्णिया में संघ का काम करने के बाद 1959 में उन्हें जनसंघ के बिहार प्रदेश संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गयी। इससे पूर्व संघ पर 1948 में लगे प्रतिबंध के विरोध में वे जेल भी गये थे।
उन दिनों सब ओर कांग्रेस और नेहरू जी का डंका बज रहा था। ऐसे विपरीत माहौल में श्री कैलाशपति मिश्र के परिश्रम से बिहार के हर जिले और तहसील तक जनसंघ का नाम और काम पहुंचा गया। आपातकाल की समाप्ति के बाद उन्होंने संगठन के निर्देश पर प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति में प्रवेश किया और पटना की विक्रम विधानसभा से विजयी होकर विधायक बने। मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने उनकी योग्यता देखकर उन्हें वित्तमंत्री की जिम्मेदारी दी।
1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन होने पर उन्हें उसकी बिहार इकाई का पहला अध्यक्ष बनाया गया। 1987 तक वे इस पद पर रहे। 1984 में उन्हें राज्यसभा में भेजा गया। भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री और उपाध्यक्ष के नाते उन्हें समय-समय पर अनेक राज्यों में चुनाव तथा संगठन सम्बन्धी कार्यों की जिम्मेदारी दी गयी, जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक निभाया।
जीवन के संध्याकाल में उन्होंने सक्रिय राजनीति से अवकाश ले लिया; पर जिन दिनों केन्द्र में भाजपा एवं सहयोगियों का शासन था, तब उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें गुजरात का राज्यपाल बनाया गया। कुछ समय उन पर राजस्थान के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी रहा। 2004 में केन्द्र में शासन बदलने पर वे इस जिम्मेदारी से मुक्त होकर पटना में ही रहने लगे।
श्री कैलाशपति मिश्र राजनीतिक क्षेत्र में कार्यरत एक निष्कंलक व्यक्तित्व वाले तपस्वी राजनीतिज्ञ थे। लगभग 50 वर्षीय राजनीतिक यात्रा में उन पर न कभी कोई आरोप लगा और न ही वे कभी किसी विवाद में फंसे। राजनीति के दलदल में कमल के समान अहंकार, बुराई, द्वेष, लोभ-लालच आदि से वे मीलों दूर रहे। वे सत्ता में भी रहे और विरोध पक्ष में भी; पर अपने विचारों से कभी विचलित नहीं हुए। इस कारण विरोधी भी उनका सम्मान करते थे।
आगे चलकर बिहार और झारखंड में भाजपा ने कई बार सत्ता का सुख भोगा। यह श्री कैलाशपति मिश्र की तपस्या का ही सुपरिणाम था। तीन नवम्बर, 2012 को पटना में लम्बी बीमारी के बाद उनका देहांत हुआ। प्रखर विचारों और विशुद्ध आचरण वाले ऐसे मनीषी राजनेता को बिहार में भाजपा के कार्यकर्ता आज भी अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं।
(संदर्भ : पांचजन्य 18.11.2012)
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5 अक्तूबर/जन्म-दिवस
तेजस्वी पत्रकार वेदप्रकाश भाटिया
श्री वेदप्रकाश भाटिया अंग्रेजी भाषा में लिखने वाले प्रखर एवं तेजस्वी पत्रकार थे। उनका जन्म अखंड भारत में पांच अक्तूबर, 1929 को झेलम जिले के पिंड गादरखान ग्राम में हुआ था। 1947 में देश के विभाजन के बाद यह क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा झेलम में ही हुई।
शिक्षा के प्रेमी वेदप्रकाश जी ने मैट्रिक की शिक्षा पंजाब विश्वविद्यालय से प्राप्त की। 1945-46 में उन्होंने बी.ए. करने के लिए लाहौर के डी.ए.वी. काॅलिज में प्रवेश लिया; पर इसी बीच देश का विभाजन हो गया। उस समय के सब झंझटों और संकटों को झेलते हुए उनका परिवार हरियाणा में यमुनानगर आ गया। यहां आकर उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
बी.ए. के बाद पढ़ाई जारी रखते हुए उन्होंने एक शिक्षण संस्थान की स्थापना की। बचपन से ही अंग्रेजी भाषा और साहित्य में उनकी बहुत रुचि थी। पंजाब वि.वि. से अंग्रेजी में एम.ए. करते हुए उन्होंने सर्वाधिक अंक प्राप्त किये। इसके बाद वे अम्बाला के एस.के.जैन काॅलिज में तथा 1957-58 में वहां के ही डी.ए.वी. काॅलिज में अंग्रेजी के प्राध्यापक हो गये।
वेदप्रकाश जी यों तो अध्यापन कर रहे थे; पर उनके मन में पत्रकारिता के बीज विद्यमान थे। अतः 1968 में वे परिवार सहित दिल्ली आ गये। यहां ‘भारत प्रकाशन’ की ओर से हिन्दी में साप्ताहिक ‘पांचजन्य’ तथा अंग्रेजी में ‘आर्गनाइजर’ का प्रकाशन होता है। वेदप्रकाश जी को आर्गनाइजर के सम्पादक श्री केवल रतन मलकानी का सहायक बनाया गया। उनके सान्निध्य में वे पत्रकारिता के गुर सीखते हुए अपनी लेखनी की धार तेज करते रहे।
कुछ वर्ष बाद ‘भारत प्रकाशन’ ने अंग्रेजी में एक दैनिक पत्र ‘मदरलैंड’ प्रारम्भ कर उसका सम्पादक श्री मलकानी को बनाया। उनके वहां जाने से आर्गनाइजर के सम्पादन की पूरी जिम्मेदारी वेदप्रकाश जी पर आ गयी। इसके बाद 1993 में अपनी सेवा-निवृत्ति तक वे ही उसके सम्पादक रहे। वेदप्रकाश जी के लेखन की धार तो प्रखर थी ही, पर उनके अध्ययन और चिंतन-मनन का दायरा भी बहुत विशाल था। अतः उनके लेख तथा ताजी सम्पादकीय टिप्पणियों की पाठक उत्सुकता से प्रतीक्षा करते थे। उनके लेखन में हिन्दू और हिन्दुत्व के प्रति अटूट निष्ठा सदा झलकती थी।
‘भारत प्रकाशन’ की आर्थिक स्थिति उन दिनों अच्छी नहीं रहती थी। कांग्रेस विरोधी होने के कारण उन्हें विज्ञापनों का अभाव झेलना पड़ता था। अतः सम्पादक तथा अन्य सहयोगियों को बहुत कम वेतन मिलता था। वेदप्रकाश जी की योग्यता देखकर कई अंग्रेजी पत्रों ने कई गुने वेतन, भत्ते और सुविधाओं पर उन्हें अपने संस्थान में बुलाना चाहा; पर वेदप्रकाश जी के लेखन का उद्देश्य धन कमाना न होकर राष्ट्रीय विचारों का प्रचार और प्रसार था।
वेदप्रकाश जी ने विभाजन अपनी आंखों से देखा था। उसकी विभीषिका के वे भुक्तभोगी थे। अतः इस बारे में वे खूब पढ़ते थे। भारत-पाक संबंधों पर उपलब्ध प्रायः सभी पुस्तकें उनके पास थीं। आर्गनाइजर से सेवा-निवृत्ति के बाद भी उनका साप्ताहिक स्तम्भ ‘किंग्स एंड कैबेजेस’ बहुत लोकप्रिय था।
यों तो वे मूलतः अंग्रेजी के पत्रकार थे; पर सेवा-निवृत्त होकर उन्होंने पांचजन्य के लिए हिन्दी में भी काफी समय तक नियमित रूप से लिखा। लेखन और सम्पादन में किसी तरह की भूल वे सहन नहीं करते थे। अपने लेखों के प्रूफ पढ़ने में उन्हें कभी संकोच नहीं होता था। उनके पास हजारों पुस्तकें थीं, फिर भी वे सदा नई पुस्तकों और संदर्भ ग्रन्थों की तलाश में रहते थे।
15 दिसम्बर, 2003 को 74 वर्ष की आयु में तेजस्वी और तपस्वी पत्रकार श्री वेदप्रकाश भाटिया की लेखनी सदा के लिए मौन हो गयी।
(संदर्भ : पांचजन्य 28.12.2003)
वनवासियों के हितचिंतक
स्वामी आत्मानंद
रामकृष्ण मिशन से संबंधित
स्वामी आत्मानंद जी का जन्म छह अक्तूबर, 1929 को ग्राम कपसदा
(रायपुर, छत्तीसगढ़) निवासी धनीराम वर्मा के घर हुआ था। जन्म से एक
दिन पूर्व उनकी माता श्रीमती भाग्यवती देवी को सपना आया कि साक्षात भगवान उनकी
गोदी में बैठे हैं और वे उन्हें दूध पिला रही हैं। धर्मपे्रमी मां ने इसे ईश्वरीय
संकेत समझ कर बच्चे का नाम ‘रामेश्वर’ रखा। तुला राशि में जन्म के कारण वे तुलेन्द्र भी कहलाए।
धनीराम जी अध्यापक थे; पर 1942 के आंदोलन में जेल जाने से उनकी सरकारी नौकरी समाप्त हो
गयी थी। कुछ समय बाद तुलेन्द्र पढ़ने नागपुर गये। वहां रामकृष्ण मिशन के छात्रावास
में उनके रहने और भोजन की व्यवस्था हो गयी। वहां उन्होंने मंत्र दीक्षा ली। वे
संन्यास भी लेना चाहते थे, पर गुरु के आदेश से
एम.एस-सी कर अति प्रतिष्ठित आई.सी.एस. परीक्षा उत्तीर्ण की; पर उसके प्रति अनिच्छा के कारण मौखिक परीक्षा छोड़ दी।
1960 में बुद्ध पूर्णिमा पर उन्होंने अमरकंटक में नर्मदा तट पर
रामकृष्ण परमहंस के चित्र के सम्मुख स्वयं ही संन्यास लेकर अपना नाम आत्मानंद रख
लिया। कई वर्ष बाद नागपुर आश्रम की अनुमति से वे कोलकाता में बेलूड़ मठ गये और
ब्रह्मचर्य दीक्षा ली। अब उनका नाम ब्रह्मचारी तेज चैतन्य हो गया। इसके बाद ऋषिकेश
में छह माह स्वामी पुरुषोत्तमानंद के पास योग वशिष्ठ का अध्ययन किया। वहां से वे
अपने गृह नगर रायपुर आये।
रायपुर में दो मास तक
विवेकानंद अपने माता-पिता के साथ रहे थे। आत्मानंद जी की इच्छा वहां एक भव्य
स्मारक बनाने की थी; पर बेलूड़ मठ ने अनुमति नहीं दी। अतः उन्होंने ‘रामकृष्ण सेवा समिति’ का गठन कर अपने बलपर इसे
बनाने का निर्णय लिया। इसमें उन्हें बहुत कष्ट और अपमान झेलने पड़े। वे स्वामी
विवेकानंद के जन्मशती वर्ष (1963) तक स्मारक पूरा
करना चाहते थे। इसके लिए काफी धन चाहिए था। अतः उन्होंने रायपुर के नगरपालिका भवन
में प्रति रविवार गीता पर प्रवचन शुरू किया। इससे कुछ धन आने लगा। यह देखकर शासन
ने उन्हें एक बड़ा भूखंड स्मारक के लिए दे दिया।
कुछ समय में वहां आश्रम
जैसा स्वरूप बन गया। 30 युवकों ने संन्यास की दीक्षा भी ली। 14 नवम्बर,
1969 को मिशन के अध्यक्ष स्वामी वीरेश्वरानंद ने
रामकृष्ण मंदिर का शिलान्यास तथा दो फरवरी, 1976 को उद्घाटन
किया। इस बीच म.प्र. में अकाल पड़ने से मंदिर के लिए एकत्रित काफी धन जनसेवा में
लग गया। फिर भी क्रमशः मंदिर, छात्रावास, पत्रिका, डाकघर, पुस्तकालय, चिकित्सालय आदि बनते चले गये। यद्यपि यह स्मारक उन्होंने अपने बल पर बनाया था; लेकिन उनके आग्रह पर 1968 में यह बेलूड़ मठ में
विलीन कर दिया गया और इसका नाम ‘रामकृष्ण मिशन विवेकानंद
आश्रम’ हो गया।
यद्यपि वे तन और मन से
संन्यासी थे; पर ‘रामकृष्ण मिशन’ उन्हें अलग मानता था। 1968 में मां सारदा के
जन्मदिवस पर बेलूड़ मठ में उन्हें विधिवत संन्यास की दीक्षा दी गयी। उन्होंने
हिन्दी, अंगे्रजी और बांग्ला के कई ग्रंथों का परस्पर अनुवाद किया।
वे टेनिस, वाॅलीबाॅल, शतरंज के खिलाड़ी तथा गीत
और संगीत प्रेमी थे। नागपुर के आश्रम में तो प्रायः वे ही आरती आदि गाते थे। गीता
और मानस पर उनके अपने प्रवचन भी प्रकाशित हुए हैं।
इसके बाद मिशन की योजना
से वे जहां भी रहे, अध्यात्म साधना के साथ जनसेवा में भी लगे रहे।
वनवासी कल्याण आश्रम के हर काम में वे पूरा सहयोग देते थे। 27 अगस्त,
1989 को रायपुर आते समय राजनादगांव में उनकी जीप एक
पुलिया से टकरा गयी। दरवाजे के पास बैठे स्वामी आत्मानंद जी नीचे गिर पड़े। तभी
जीप पीछे पलटी और उनके सीने को कुचल दिया। इससे सेवा पथ के पथिक स्वामी जी का वहीं
दुखद प्राणांत हो गया।
(हमारे महान वननायक, भाग 3, त्रिलोकी नाथ सिनहा)
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दिल्ली के अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य
अपने शौर्य से इतिहास की धारा मोड़ने वाले वीर हेमू का जन्म दो अक्तूबर, 1501 (विजयादशमी) को ग्राम मछेरी (अलवर, राजस्थान) में हुआ था। उनके पिता राय पूरणमल पहले पुरोहित थे; पर फिर वे रिवाड़ी (हरियाणा) आकर नमक और बारूद में प्रयुक्त होने वाले शोरे का व्यापार करने लगे। हेमू ने यहां आकर शस्त्र के साथ ही संस्कृत, हिन्दी, फारसी, अरबी तथा गणित की शिक्षा ली। इसके बाद वह आगरा आ गये और तत्कालीन अफगान सुल्तान सलीम शाह के राज्य में बाजार निरीक्षक की नौकरी करने लगे।
जब सलीम के बेटे फिरोजशाह को मारकर मुहम्मद आदिल सुल्तान बना, तो हेमू की उन्नति होती चली गयी और वह कोतवाल, सामन्त, सेनापति और फिर प्रधानमन्त्री बन गये। जब भरे दरबार में सिकन्दर खां लोहानी ने आदिलशाह को मारना चाहा, तो हेमू ने ही उसकी रक्षा की। इससे वह आदिलशाह का विश्वासपात्र हो गये। उन्होंने कई युद्धों में भाग लिया और सबमें विजयी हुए। इससे उनकी गणना भारत के श्रेष्ठ वीरों में होने लगी। उन्होंने इब्राहीम खां, मुहम्मद खां गोरिया, ताज कर्रानी, रुख खान नूरानी आदि अनेक विद्रोहियों को पराजित कर पंजाब से लेकर बिहार और बंगाल तक अपनी वीरता के झंडे गाड़ दिये। यद्यपि ये अभियान उन्होंने दूसरों के लिए ही किये थे; पर उनके मन में अपना स्वतन्त्र हिन्दू राज्य स्थापित करने की प्रबल इच्छा विद्यमान थी।
हुमायूं की मृत्यु के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला। अतः हेमू ने आगरा पर धावा बोल दिया। वहां का मुगल सूबेदार इस्कंदर खान उजबेक तो उनका नाम सुनते ही मुख्य सेनापति तर्दीबेग के पास दिल्ली भाग गया। हेमू ने अब दिल्ली को निशाना बनाया। भयंकर मारकाट के बाद तर्दीबेग भी मैदान छोड़ गया। इस प्रकार हेमू की इच्छा पूरी हुई और वह सात अक्तूबर, 1556 को हेमचन्द्र विक्रमादित्य के नाम से दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ़ हुए। उस समय कुछ अफगान और पठान सूबेदारों का समर्थन भी उन्हें प्राप्त था।
उस समय राजनीतिक दृष्टि से भारत विभक्त था। बंगाल, उड़ीसा और बिहार में आदिलशाह द्वारा नियुक्त सूबेदार राज्य कर रहे थे। राजस्थान की रियासतें आपस में लड़ने में ही व्यस्त थीं। गोंडवाना में रानी दुर्गावती, तो दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य प्रभावी था। उत्तर भारत के अधिकांश राज्य भी स्वतन्त्र थे। अकबर उस समय केवल नाममात्र का ही राजा था। ऐसे में दिल्ली और आगरा का शासक होने के नाते हेमू का प्रभाव काफी बढ़ गया। मुगल अब उसे ही अपना शत्रु क्रमांक एक मानने लगे। अकबर ने अपने संरक्षक बैरम खां के नेतृत्व में सम्पूर्ण मुगल शक्ति को हेमू के विरुद्ध एकत्र कर लिया।
पांच नवम्बर, 1556 को पानीपत के मैदान में दूसरा युद्ध हुआ। हेमू के डर से अकबर और बैरमखां युद्ध से दूर ही रहे। प्रारम्भ में हेमू ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिये; पर अचानक एक तीर उनकी आंख को वेधता हुआ मस्तिष्क में घुस गया। हेमू ने उसे खींचकर आंख पर साफा बांध लिया; पर अधिक खून निकलने से वह बेहोश होकर हौदे में गिर गये। यह सूचना पाकर बैरमखां ने अविलम्ब अकबर के हाथों उनकी हत्या करा दी। उनका सिर काबुल भेज दिया गया और धड़ दिल्ली में किले के द्वार पर लटका दिया। इसके बाद दिल्ली में भयानक नरसंहार हुआ। मृत सैनिकों तथा नागरिकों के सिर का टीला बनाया गया। हेमू के पुतले में बारूद भरकर उसका दहन किया गया। फिर अकबर ने हेमू की समस्त सम्पत्ति के साथ आगरा पर भी अधिकार कर लिया।
इस प्रकार साधारण परिवार का होते हुए भी हेमचंद्र ने 22 युद्ध जीतकर ‘विक्रमादित्य’ उपाधि धारण की और दिल्ली में हिन्दू साम्राज्य स्थापित किया। कई इतिहासकारों ने उन्हें ‘मध्यकालीन भारत का नेपोलियन’ कहा है।
(संदर्भ : अ.भा.इति.संकलन योजना का पत्रक आदि)
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7 अक्तूबर/जन्म-दिवस
बंगाल की प्रथम शाखा के
स्वयंसेवक कालिदास बसु
कोलकाता उच्च न्यायालय के
वरिष्ठ अधिवक्ता तथा पूर्वोत्तर भारत में संघ कार्य के एक प्रमुख स्तम्भ श्री
कालिदास बसु (कालीदा) का जन्म सात अक्तूबर, 1924 (विजयादशमी) पर
फरीदपुर (वर्तमान बंगलादेश) में हुआ था। 1939 में कक्षा नौ
में पढ़ते समय उन्होंने पहली बार श्री बालासाहब देवरस का बौद्धिक सुना, जो उन दिनों नागपुर से बंगाल में शाखा प्रारम्भ करने के लिए आये थे। इस
बौद्धिक से प्रभावित होकर वे नियमित शाखा जाने लगे।
इसके बाद तो बालासाहब और
उनके बाद वहां आने वाले सभी प्रचारकों से उनकी घनिष्ठता बढ़ती गयी। 1940 में वे संघ शिक्षा वर्ग में भाग लेने नागपुर गये। श्री गुरुजी उस वर्ग में
कार्यवाह थे। संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार ने वहां अपने जीवन का अंतिम बौद्धिक
दिया था। वर्ग समाप्ति के कुछ दिन बाद ही डा. जी का निधन हो गया। इन दोनों
महामानवों के पुण्य सान्निध्य से कालीदा के जीवन में संघ-विचार सदा के लिए रच-बस
गया।
कक्षा 12 की परीक्षा देकर वे बंगाल की सांस्कृतिक नगरी नवद्वीप में विस्तारक बन कर आ
गये। यहां रहकर वे संघ कार्य के साथ ही अपनी पढ़ाई भी करते रहे। उन दिनों द्वितीय
विश्व युद्ध चल रहा था। लोगों में बड़ी दहशत फैली थी। जापानी बमबारी के भय से
कोलकाता तथा अन्य बड़े नगरों से लोग घर छोड़-छोड़कर भाग रहे थे। बंगाल में उन
दिनों संघ कार्य बहुत प्रारम्भिक अवस्था में था; पर समाज में साहस
बनाये रखने में संघ के सभी कार्यकर्ताओं ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कालीदा
भी इनमें अग्रणी रहे।
शिक्षा पूर्ण कर कालीदा
नवद्वीप में ही जिला प्रचारक बनाये गये। 1947 में देश का
विभाजन हो गया और बंगाल का बड़ा हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) बन
गया। बड़ी संख्या में हिन्दू लुट-पिट कर भारतीय बंगाल में आने लगे। संघ ने ऐसे
लोगों की भरपूर सहायता की। कालीदा दो वर्ष तक नवद्वीप में ही रहकर इन सब कामों की
देखभाल करते रहे। इसके बाद 1949 में उन्हें महानगर
प्रचारक के नाते कोलकाता बुला लिया गया।
1952 तक प्रचारक रहने के बाद उन्होंने फिर से शिक्षा प्रारम्भ
कर कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की और कोलकाता उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। एक
सफल वकील के नाते उन्होंने भरपूर धन और ख्याति अर्जित की। संघ कार्य में लगातार
सक्रिय रहने से उनके दायित्व भी क्रमशः बढ़ते गये। महानगर कार्यवाह, प्रान्त कार्यवाह, प्रान्त संघचालक, क्षेत्र संघचालक
और फिर केन्द्रीय कार्यकारिणी के वे सदस्य रहे। इसके साथ ही वे ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद’ के मार्गदर्शक तथा
कोलकाता में विधान नगर ‘विवेकानंद केन्द्र’ के उपसभापति थे। अध्यात्म के प्रति रुझान होने के कारण उन्होंने ‘रामकृष्ण मिशन’ से विधिवत दीक्षा भी ली थी।
बंगाल में राजनीतिक रूप
से कांग्रेस और वामपंथियों के प्रभाव के कारण स्वयंसेवकों को अनेक कठिनाइयों का
सामना करना पड़ता है। इन बाधाओं में कालीदा सदा चट्टान बनकर खड़े रहे। वे कोलकाता
से प्रकाशित होने वाले हिन्दू विचारों के साप्ताहिक पत्र ‘स्वस्तिका’ के न्यासी थे। पूर्वोत्तर भारत को प्रायः बाढ़, तूफान तथा चक्रवात जैसी आपदाओं का सामना करना पड़ता है। स्वयंसेवक ऐसे में ‘वास्तुहारा सहायता समिति’ के नाम से धन एवं सहायता
सामग्री एकत्र कर सेवा कार्य करते हैं। कालीदा इस समिति में भी सक्रिय रूप से
जुड़े थे।
स्वयं सक्रिय रहने के साथ
ही उन्होंने अपने परिवारजनों को भी संघ विचार से जोड़ा। उनकी पत्नी श्रीमती
प्रतिमा बसु ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की प्रांत
संचालिका थीं। ऐसे निष्ठावान कार्यकर्ता कालिदास बसु का 11 दिसम्बर,
2010 को न्यायालय में अपने कक्ष में हुए भीषण
हृदयाघात से देहावसान हुआ।
(संदर्भ: पांचजन्य, आर्गनाइजर, हिन्दू चेतना,
स्वस्तिका, अंतरजाल)








🙏कृपया २ अक्टूबर की तिथि में स्व.लालबहादुर शास्त्री जी का जीवन-वृत सम्मिलित करें, धन्यवाद
जवाब देंहटाएंसरदार चिरंजीव सिंह जी का आज 20 नवम्बर 2023 को निधन हो गया है
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