दिसम्बर पहला सप्ताह

1 दिसम्बर/जन्म-तिथि

देशानुरागी राजा महेन्द्र प्रताप सिंह

राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ऐसे स्वाधीनता सेनानी थे, जिन्होंने विदेशों में रहकर देश की आजादी के लिए प्रयास किये। उनका जन्म मुरसान (हाथरस, उ.प्र.) के एक प्रसिद्ध जाट राजवंश में एक दिसम्बर, 1886 को हुआ था। वे अपने पिता राजा घनश्याम सिंह के तीसरे पुत्र थे। उनका लालन-पालन और प्राथमिक शिक्षा वृंदावन में हुई। इसके बाद उन्होंने अलीगढ़ के मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलिज से प्रथम श्रेणी में एम.ए की परीक्षा उत्तीर्ण की। यही विद्यालय आजकल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कहलाता है।  

एक बार उन्होंने देखा कि एक प्रदर्शिनी में छोटी सी बात पर एक छात्र की पुलिस वालों से झड़प हो गयी। प्रधानाचार्य ने इस पर उसे तीन साल के लिए विद्यालय से निकाल दिया। इसके विरोध में राजा महेन्द्र प्रताप के नेतृत्व में छात्रों ने हड़ताल कर दी। उस समय वे बी.ए के छात्र थे। उनके ओजस्वी भाषण से नाराज होकर उन्हें भी विद्यालय से निकाल दिया गया। 

राजा महेन्द्र प्रताप अपने पिताजी तथा एक अध्यापक श्री अशरफ अली से बहुत प्रभावित थे, जो हिन्दू धर्म व संस्कृति से प्रेम करते थे। छात्र जीवन में ही उनका विवाह पंजाब के एक राजवंश में हो गया। 1906 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में जाने पर उनके ससुर ने उनसे संबंध तोड़ लिये।

राजा महेन्द्र प्रताप जब देश भ्रमण पर गये, तो उन्हें देशवासियों की दुर्दशा और शासन के अत्याचार देखने को मिलेे। इससे उनका मन बहुत दुखी हुआ। 17 अगस्त, 1917 को उन्होंने विश्व यात्रा के लिए प्रस्थान किया। वे रोम, पेरिस, बर्लिन तथा लंदन गये। इस यात्रा से उनके मन में देश की आजादी की ललक और तीव्र हो गयी। भारत लौटकर उन्होंने अपनी सम्पत्ति से एक विद्यालय की स्थापना की। इसके बाद वे फिर विदेश प्रवास पर चल दिये।

अगले 31 साल वे जर्मनी, स्विटरजरलैंड, अफगानिस्तान, तुर्की, यूरोप, अमरीका, चीन, जापान, रूस आदि देशों में घूमकर आजादी की अलख जगाते रहे। इस पर शासन ने उन्हें राजद्रोही घोषित कर उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली। दिसम्बर 1915 में उन्होंने विदेश में अपनी अध्यक्षता में भारत की अस्थायी सरकार की। इसमें मौलाना बरकत अली को प्रधानमंत्री बनाया गया।

वे भारत की ही नहीं, तो विश्व के हर देश की स्वाधीनता के पक्षधर थे। 1925 में उन्होंने न्यूयार्क में नीग्रो लोगों की स्वतंत्रता के समर्थन में भाषण दिया। सितम्बर 1938 में उन्होंने एक सैनिक बोर्ड का गठन किया, जिसमें वे अध्यक्ष, रासबिहारी बोस उपाध्यक्ष तथा आनंद मोहन सहाय महामंत्री थे। 

द्वितीय विश्व युद्ध में उन्हें बंदी बना लिया गया; पर कुछ नेताओं के प्रयास से वे मुक्त करा लिये गये। अगस्त 1945 में जलयान से चेन्नई पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत हुआ। इसके बाद वे देश में जहां भी गये, देशभक्त जनता ने उन्हें सिर आंखों पर बैठाया। स्वाधीनता के लिए मातृभूमि से 32 वर्ष दूर रहने तथा अपनी सारी सम्पत्ति होम कर देने वाले ऐसे त्यागी पुरुष के दर्शन करने लोग दूर-दूर से पैदल चलकर आते थे। 

राजा महेन्द्र प्रताप पंचायती राज को ही वास्तविक स्वाधीनता मानते थे। वे आम आदमी के अधिकारों के समर्थक तथा नौकरशाही के अत्यधिक अधिकारों के विरोधी थे। वे 1957 में मथुरा से लोकसभा के निर्दलीय सदस्य बने। वे ‘भारतीय स्वाधीनता सेनानी संघ’ तथा ‘अखिल भारतीय जाट महासभा’ के भी अध्यक्ष रहे। 29 अपै्रल, 1979 को उनका देहांत हुआ।

(संदर्भ : मातृवंदना, क्रांतिवीर नमन अंक, मार्च-अपै्रल 2008/विकीपीडिया आदि)
..................

1 दिसम्बर/जन्म-दिवस

बाल उपवन के सुमन द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

अच्छे और कालजयी साहित्य की रचना एक कठिन कार्य है; पर इससे भी कठिन है, बाल साहित्य का सृजन। इसके लिए स्वयं बच्चों जैसा मन और मस्तिष्क बनाना होता है। श्री द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐसे ही एक साहित्यकार थे, जिनके लिखे गीत एक समय हर बच्चे की जिह्ना पर रहते थे।

श्री माहेश्वरी का जन्म 1 दिसम्बर, 1916 को आगरा (उ.प्र.) के रौहता गाँव में हुआ था। बाल्यकाल से ही वे अत्यन्त मेधावी थे। अतः पढ़ने में सदा आगे ही रहते थे; पर बच्चों के लिए लिखे जाने वाले गद्य और पद्य साहित्य में कठिन शब्दों और भावों को देखकर उन्हें बहुत पीड़ा होती थी। इस कारण बच्चे उन गीतों को याद नहीं कर पाते थे। उनका मत था कि यदि बच्चों को अच्छे और सरल भावपूर्ण गीत दिये जायें, तो वे गन्दे फिल्मी गीत नहीं गायेंगे। अतः उन्होंने स्वयं ही इस क्षेत्र में उतरकर श्रेष्ठ साहित्य के सृजन को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया।

उन्हें पढ़ने और पढ़ाने का बड़ा चाव था। पढ़ने के लिए वे इंग्लैण्ड भी गये; पर आजीविका के लिए उन्होंने भारत में शिक्षा क्षेत्र को चुना। अनेक महत्वपूर्ण पदों पर काम करते हुए वे शिक्षा निदेशक और निदेशक साक्षरता निकेतन जैसे पदों पर पहुँचे। उनके कई कालजयी गीत आज भी हिन्दी के पाठ्यक्रम में हैं और बच्चे उन्हें बड़ी रुचि से पढ़ते हैं। 

उनके एक लोकप्रिय गीत ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ से बाल समीक्षक कृष्ण विनायक फड़के बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने अपनी वसीयत में ही लिख दिया कि उनकी शवयात्रा में ‘राम नाम सत्य है’ के बदले बच्चे मिलकर यह गीत गायें, तो उनकी आत्मा को बहुत शान्ति मिलेगी।

उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग ने अपने प्रचार पटों में इस गीत को लिखवाया और उर्दू में भी ‘हम सब फूल एक गुलशन के’ पुस्तक प्रकाशित की। श्री माहेश्वरी ने बच्चों के लिए 30 से भी अधिक पुस्तकें लिखीं। साक्षरता विभाग में काम करते समय उन्होंने नवसाक्षरों के लिए भी पाँच पुस्तकें लिखीं। इसके अतिरिक्त भी उन्होंने कई काव्य संग्रह और खण्ड काव्यों की रचना की।

उन दिनों बड़े लोगों के लिए देश के हर भाग में कवि सम्मेलन होते थे। यह देखकर माहेश्वरी जी ने बाल कवि सम्मेलन प्रारम्भ कराये। उत्तर प्रदेश में शिक्षा सचिव रहते हुए उन्होंने कई कवियों के जीवन पर वृत्त चित्र बनवाए। इनमें सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ पर बनवाया हुआ वृत्त चित्र अविस्मरणीय है। 

उन्हें साहित्य सृजन के लिए देश के सभी भागों से अनेक मान-सम्मान मिले; पर जब उनके गीतों को बच्चे सामूहिक रूप से या नाट्य रूपान्तर कर गाते थे, तो वे उसे अपना सबसे बड़ा सम्मान मानते थे। माहेश्वरी जी जहाँ वरिष्ठ कवियों का सम्मान करते थे, वहीं नये साहित्यकारों को भी भरपूर स्नेह देते थे। आगरा के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान को वे एक तीर्थ मानते थे। इसमें जो विदेशी या भारत के अहिन्दीभाषी प्रान्तों के छात्र आते थे, उनके साथ माहेश्वरी जी स्वयं बड़ी रुचि से काम करते थे। 

हम सब सुमन एक उपवन के; वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो; जिसने सूरज चाँद बनाया; इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है...जैसे अमर गीतों के लेखक श्री द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का 29 अगस्त, 1998 को देहावसान हुआ। उनकी आत्मकथा ‘सीधी राह चलता रहा’ उनके जीवन का दर्पण है।
...............

1 दिसम्बर/जन्म-दिवस     

स्वधर्म रक्षक तालिम रुकबो

पूर्वोत्तर भारत का सुदूर अरुणाचल प्रदेश चीन से लगा होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। पहले उसे नेफा कहा जाता था। वहाँ हजारों वर्ष से रह रही जनजातियाँ सूर्य और चन्द्रमा की पूजा करती हैं; पर वे उनके मन्दिर नहीं बनातीं। इस कारण पूजा का कोई व्यवस्थित स्वरूप भी नहीं है। इसका लाभ उठाकर मिशनरियों ने उन्हें हिन्दुओं से अलग करने का प्रयास किया। उन्होंने निर्धन एवं अशिक्षित वनवासियों की मजबूरी का लाभ उठाकर हजारों लोगों को धर्मान्तरित कर लिया। 
अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट जिले में एक दिसम्बर, 1938 को जन्मे श्री तालिम रुकबो ने शीघ्र ही इस खतरे को पहचान लिया। देशविरोधी तत्वों का विस्तार रोकने के लिए उन्होंने आह्नान किया कि अपने परम्परागत त्योहार सब मिलकर मनायें। उन्होंने जनजातीय आस्था पर हो रहे कुठाराघात को रोकने के लिए पूजा की एक नई पद्धति विकसित की। उनके प्रयासों का बहुत अच्छा फल निकला। राज्य शासन ने भी स्थानीय त्योहार ‘सोलुंग’ को सरकारी गजट में मान्यता देकर उस दिन छुट्टी घोषित की। 
श्री तालिम रुकबो ने 1976 में सरकारी नौकरी छोड़कर पूरा समय समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने कालबाह्य हो चुके अपने प्राचीन रीति-रिवाजों को समयानुकूल बनाया। वे एक श्रेष्ठ साहित्यकार भी थे। उन्होंने अंग्रेजी तथा अपनी जनजातीय भाषा में कई पुस्तकें लिखीं। उन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी परम्परा से चले आ रहे लोकगीतों तथा कथाओं को संकलित कर उन्हें लोकप्रिय बनाया। इससे संस्कारहीन अंग्रेजी गीतों से प्रभावित हो रही नयी पीढ़ी फिर से अपनी परम्परा की ओर लौट आई।  
विश्व भर के जनजातीय समाजों में पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नदी-तालाब अर्थात प्रकृति पूजा का बड़ा महत्व है। श्री रुकबो की जनजाति में दोनी पोलो (सूर्य और चन्द्रमा) की पूजा विशेष रूप से होती है। श्री रुकबो ने ‘दोनी पोलो येलाम केबांग’ नामक संगठन की स्थापना कर लोगों को जागरूक किया। उन्होंने सैकड़ों गावों में ‘दोनी पोलो गांगीन’ अर्थात सामूहिक प्रार्थना मंदिर बनवाये तथा साप्ताहिक पूजा पद्धति प्रचलित की। पूजागृह बनने के बाद स्थानीय युवक-युवतियाँ परम्परागत ढंग से उनकी सज्जा भी करते हैं। 
इस प्रकार श्री रुकबो के प्रयासों से नयी पीढ़ी फिर धर्म से जुड़ने लगी। वनवासी कल्याण आश्रम तथा विश्व हिन्दू परिषद के सम्पर्क में आने से उनके कार्य को देश भर के लोगों ने जाना और उन्हें सम्मानित किया। लखनऊ के ‘भाऊराव देवरस सेवा न्यास’ ने उन्हें पुरस्कृत कर उनके सामाजिक कार्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। इससे उत्साहित होकर और भी कई लोग इस कार्य में पूरा समय लगाने लगे। इस प्राकर वह अभियान क्रमशः देश और धर्म विरोधी तत्वों के विरुद्ध एक सशक्त आंदोलन बन गया।
भारत के सीमान्त प्रदेश में भारत भक्ति और स्वधर्म रक्षा की अलख जगाने वाले, जनजातीय समाज की सेवा और सुधार हेतु अपना जीवन समर्पित करने वाले श्री तालिम रुकबो का 30 दिसम्बर, 2001 को देहान्त हुआ। उनके द्वारा धर्मरक्षा के लिए चलाया गया आन्दोलन अब भी जारी है। जनजातियों में पूजा-पद्धतियों का विकास हो रहा है। वनवासी गाँवों में पूजास्थल के माध्यम से सामाजिक समरसता एवं संगठन का भाव बढ़ रहा है। 
(संदर्भ: भाऊराव देवरस सेवा न्यास का पत्रक तथा पांचजन्य)
.........................

2 दिसम्बर/पुण्य-तिथि                     

मातृभक्त गुरुदास बनर्जी 

इन दिनों प्रायः लोग बड़ी डिग्री पाकर या ऊंची कुर्सी पर बैठकर अपने माता-पिता की सेवा और सम्मान करना भूल जाते हैं; पर श्री गुरुदास बनर्जी ने कोलकाता विश्वविद्यालय के उपकुलपति तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होते हुए भी आजीवन अपनी माता की सेवा का व्रत निभाया।

गुरुदास बनर्जी का जन्म 26 जनवरी, 1844 को कोलकाता में हुआ था। उन्होंने 1864 में स्वर्ण पदक के साथ गणित में एम.ए. किया। इसके बाद 1865 में बी.एल तथा 1876 में कानून में डॉक्टर की उपाधि (डी.एल.) प्राप्त की। वे कई वर्ष बहरामपुर कॉलिज में कानून के प्राध्यापक रहे। इसके बाद 1872 से वे कोलकाता उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे।

1878 में वे कोलकाता वि.वि. में ‘टैगोर लॉ प्रोफेसर’ बने। इस पद पर रहकर उन्होंने हिन्दू विवाह कानून तथा स्त्रीधन विषय पर भाषण दिये। वे 1879 में कोलकाता वि.वि. के फैलो, 1887 में बंगाल विधान परिषद के सदस्य, 1888 में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और फिर मुख्य न्यायाधीश बनाये गये। शिक्षाशास्त्री होने के कारण वे दो वर्ष तक कोलकाता वि.वि. में उपकुलपति भी रहे। वे इस पद पर बैठने वाले पहले भारतीय थे। 

1904 में सरकारी सेवा से अवकाश लेने के बाद उन्हें नाइटहुड (सर) की उपाधि दी गयी। उन्होंने ‘ए फ्यू थाट्स ऑन एजूकेशन’ नामक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी, जिसमें उनके शिक्षा में सुधार सम्बन्धी विचार तथा अनुभव संग्रहित हैं। उनकी धर्म-कर्म में भी बहुत रुचि थी। वे स्वयं को गर्वपूर्वक कट्टर सनातनी कहते थे। उन्होेंने हिन्दू धर्म के व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाते हुए कई पुस्तकें लिखीं। इनमें बंगला में लिखित ‘ज्ञान ओ कर्म’ बहुत प्रसिद्ध हुई।

श्री गुरुदास बनर्जी की मां ने काफी कष्ट सहकर उन्हें पढ़ाया और बड़ा किया था। अतः अपनी मां के प्रति उनके मन में अत्यधिक पूज्यता का भाव था। उनकी माता जी प्रतिदिन गंगा स्नान करने जाती थीं। जब वृद्ध होने के कारण उन्हें गंगा तक जाने में असुविधा होने लगी, तो श्री बनर्जी स्वयं प्रतिदिन उनके स्नान व पूजा के लिए नदी से ताजा गंगाजल लेकर आते थे।

उन दिनों बंगाल में श्री ईश्वरचंद्र विद्यासागर एक समाज सुधारक के नाते प्रसिद्ध थे। उन्होंने बाल-विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए बहुत प्रयास किये। अतः समाज के रुढ़िवादी लोग उनका विरोध करते थे। उन्होंने श्री विद्यासागर को समाज-बहिष्कृत कर रखा था। 

यद्यपि श्री बनर्जी की मां स्वयं अनेक कर्मकांड तथा रुढ़ियों का पालन करती थीं; पर वे श्री विद्यासागर के इस काम की समर्थक थीं। उनकी इच्छा थी कि उनकी अंत्येष्टि में श्री विद्यासागर भी उपस्थित हों। श्री गुरुदास बनर्जी ने समाज के भारी विरोध को सहते हुए भी श्री विद्यासागर को बुलाकर अपनी मां की अंतिम इच्छा का सम्मान किया।

बचपन में मां की बीमारी में जिस धाय मां ने उन्हें दूध पिलाया था, वह एक बार उनसे मिलने न्यायालय में आ गयीं। जैसे ही श्री बनर्जी ने उन्हें देखा, तो कुर्सी से उठकर उनके चरणों में माथा टेककर प्रणाम किया। ऐसे श्रेष्ठ विद्वान, शिक्षाशास्त्री, न्यायविद् तथा मातृभक्त श्री गुरुदास बनर्जी का दो दिसम्बर, 1918 को देहांत हुआ। उनके नाम पर फूलबागान, कोलकाता में एक विद्यालय तथा वि.वि. में एक प्राध्यापक पीठ बनी है।

(संदर्भ : अंतरजाल पर उपलब्ध सामग्री)
-----------------------------------------------------------
3 दिसम्बर/जन्म-दिवस

आत्मविश्वास के धनी राजेन्द्र बाबू

बिहार के एक विद्यालय में परीक्षा समाप्ति के बाद कक्षाध्यापक महोदय सबको परीक्षाफल सुना रहे थे। उनमें एक प्रतिभाशाली छात्र राजेन्द्र भी था। उसका नाम जब उत्तीर्ण हुए छात्रों की सूची में नहीं आया, तो वह अध्यापक से बोला, ‘‘गुरुजी, आपने मेरा नाम तो पढ़ा ही नहीं।’’
अध्यापक ने हँसकर कहा, ‘‘तुम्हारा नाम नहीं है, इसका साफ अर्थ है तुम इस वर्ष फेल हो गये हो। ऐसे में मैं तुम्हारा नाम कैसे पढ़ता ?’’ अध्यापक को मालूम था कि वह छात्र कई महीने मलेरिया बुखार के कारण बीमार रहा था। इस कारण वह लम्बे समय तक विद्यालय भी नहीं आ पाया था। ऐसे में छात्र का अनुत्तीर्ण हो जाना स्वाभाविक ही था।
लेकिन वह छात्र हिम्मत से बोला, ‘‘नहीं गुरुजी, कृपया आप सूची को दुबारा देख लें। मेरा नाम इसमें अवश्य होगा।’’
अध्यापक ने कहा, ‘‘नहीं राजेन्द्र, तुम्हारा नाम सूची में नहीं है। तुम इस बार उत्तीर्ण नहीं हो सके हो।’’ 
राजेन्द्र ने खड़े होकर ऊँचे स्वर में कहा, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता कि मैं उत्तीर्ण न होऊँ।’’
अब अध्यापक को भी क्रोध आ गया। वे बोले, ‘‘नीचे बैठ जाओ। अगले वर्ष और परिश्रम करो।’’
पर राजेन्द्र चुप नहीं हुआ, ‘‘नहीं गुरुजी, आप अपनी सूची एक बार और जाँच लें। मेरा नाम अवश्य होगा।’’
अध्यापक ने झुंझलाकर कहा, ‘‘यदि तुम नीचे नहीं बैठे तो मैं तुम पर जुर्माना कर दूँगा।’’
पर वह छात्र भी अपनी बात से पीछे हटने को तैयार नहीं था। अतः अध्यापक ने उस पर एक रु. जुर्माना कर दिया। लेकिन राजेन्द्र बार-बार यही कहता रहा, ‘‘मैं अनुत्तीर्ण नहीं हो सकता।’’ 
अध्यापक ने अब जुर्माना दो रु. कर दिया। बात बढ़ती गयी। धीरे-धीरे जुर्माने की राशि पाँच रु. तक पहुँच गयी। उन दिनों पाँच रु. की कीमत बहुत थी। सरकारी अध्यापकों के वेतन भी 15-20 रु. से अधिक नहीं होते थे; लेकिन आत्मविश्वास का धनी वह छात्र किसी भी तरह दबने का नाम नहीं ले रहा था। तभी एक चपरासी दौड़ता हुआ प्राचार्य जी के पास से कोई कागज लेकर आया। जब वह कागज अध्यापक ने देखा, तो वे चकित रह गये। परीक्षा में सर्वाधिक अंक उस छात्र ने ही पाये थे। उसका अंकपत्र फाइल में सबसे ऊपर रखा था; पर भूल से वह प्राचार्य जी के कमरे में ही रह गया। 
अब तो अध्यापक ने उस छात्र की पीठ थपथपाई। सब छात्रों ने भी ताली बजाकर उसका अभिनन्दन किया। यही बालक आगे चलकर भारत का पहला राष्ट्रपति बना। उनका जन्म ग्राम जीरादेई, जिला छपरा, बिहार में 3 दिसम्बर, 1884 को श्री महादेव सहाय के घर में हुआ था। छात्र जीवन से ही मेधावी राजेन्द्र बाबू ने कानून की परीक्षा उत्तीर्णकर कुछ समय वकालत की; पर 33 वर्ष की अवस्था में गांधी जी के आह्नान पर वे वकालत छोड़कर देश की स्वतन्त्रता के लिए हो रहे चम्पारण आन्दोलन में कूद पड़े।
सादा जीवन, उच्च विचार के धनी डा. राजेन्द्र प्रसाद को ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया गया। राष्ट्रपति पद से मुक्ति के बाद वे दिल्ली के सरकारी आवास की बजाय पटना में अपने निजी आवास ‘सदाकत आश्रम’ में ही जाकर रहे। 28 फरवरी, 1963 को वहीं उनका देहान्त हुआ। उनके जन्म दिवस तीन दिसम्बर देश में अधिवक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रपति के रूप में वे प्रधानमन्त्री नेहरू जी के विरोध के बाद भी सोमनाथ मन्दिर की पुनप्र्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए।  
............................
4 दिसम्बर/जन्म-दिवस

शिक्षा एवं गोप्रेमी सांसद स्वामी ब्रह्मानंद

स्वामी ब्रह्मानंद भारत की संसद के पहले संन्यासी सांसद थे। उनका जन्म ग्राम बरहरा (हमीरपुर, उ.प्र.) में चार दिसम्बर, 1894 को हुआ था। उनका बचपन का नाम शिवदयाल था। उनके पिता श्री मातादीन लोधी तथा माता श्रीमती यशोदाबाई थीं। घर में अच्छी खेतीबाड़ी थी। तत्कालीन प्रथा के अनुसार नौ वर्ष का होने पर उनका विवाह हो गया; पर उनके मन में सेवा भाव की प्रधानता थी। अतः अपनी युवा पत्नी, दो वर्ष की बालिका तथा छह माह के बालक को छोड़कर उन्होंने 23 वर्ष की अवस्था में संन्यास ले लिया। 
भगवा धारण कर वे कुछ समय हिमालय में रहे। फिर 12 वर्ष तक पैदल ही पूरे देश का भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने देशवासियों की भावनाओं को समझा। उन्हें यह बात ध्यान में आयी कि भारत की मूल समस्या अशिक्षा है। अतः उन्होंने पूरी शक्ति इसी काम में लगा दी। पंजाब भ्रमण के दौरान गांधीजी के आह्वान पर उन्होंने खादी पहनने का व्रत लिया। उन्होंने पंजाब में अनेक हिन्दी पाठशालाएं खुलवाईं। फिर बीकानेर के आसपास जलविहीन क्षेत्रों में विशाल तालाब बनवाये। इसके बाद अपने गृह क्षेत्र में आकर शिक्षा के उत्थान में लग गये। उनके आग्रह पर 1928 में गांधी जी भी राठ आये। स्वाधीनता आंदोलन में वे कई बार जेल भी गये।
स्वामी जी 1967 से 1977 तक हमीरपुर से सांसद रहे। एक बार जनसंघ और दूसरी बार कांग्रेस ने उन्हें प्रतिनिधि बनाया। उन्होंने संन्यास जीवन में अध्यात्म की बजाय सामाजिक सरोकारों पर अधिक ध्यान दिया। वे किसी आश्रम या अखाड़े से नहीं जुड़े तथा सांसद निधि का पैसा शिक्षा के प्रसार में ही खर्च किया। अपना निजी खर्च वे भिक्षा से प्राप्त धन से चलाते थे। संन्यासी जीवन में उन्होंने कभी पैसे को नहीं छुआ। उन्होंने 1938 में राठ (हमीरपुर) में स्वामी ब्रह्मानंद इंटर काॅलिज, 1943 में ब्रह्मानंद संस्कृत विद्यालय तथा 1960 में ब्रह्मानंद महाविद्यालय की स्थापना की। वे अन्य विद्यालयों को भी सहयोग करते थे। आज बुंदेलखंड क्षेत्र में उनके नाम से कई विद्यालय चल रहे हैं। उ.प्र. के मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त उन्हें ‘बुंदेलखंड के मालवीय’ कहते थे।
शिक्षा के साथ ही गोरक्षा के प्रति उनके मन में बहुत अनुराग था। जब गोरक्षा के लिए दिल्ली में सत्याग्रह हुआ, तो वे हजारों लोगों के साथ पैदल ही दिल्ली चल दिये तथा 1966 की रामनवमी पर वहां सत्याग्रह किया। उनके जत्थे में आम ग्रामीणों के साथ अनेक संत भी थे। सरकार ने उन्हें तिहाड़ जेल में बंद कर दिया। 1966 के गोरक्षा आंदोलन तथा संसद पर हुए विराट प्रदर्शन में भी वे अग्रणी भूमिका में थे। इससे उन्हें भारी लोकप्रियता मिली। अतः भारतीय जनसंघ का ध्यान उनकी ओर गया तथा 1967 में वे सांसद बने।
स्वामी ब्रह्मानंद कहते थे कि गोरक्षा के लिए वे अपने प्राण भी देने को तैयार हैं। संसद में गोरक्षा पर उन्होंने जो भाषण दिया, वह बहुचर्चित है। उस दौरान कांग्रेस सरकार तथा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। भारतीय जनसंघ ने इसका विरोध किया; पर स्वामी जी इसके समर्थक थे। अतः जनसंघ से उनकी दूरियां बढ़ने लगीं। इसका लाभ उठाकर इंदिरा गांधी उन्हें कांग्रेस में ले आयीं और फिर वे कांग्रेस से सांसद बने। 
13 सितम्बर 1984 को 90 वर्ष की सुदीर्घ आयु में स्वामी जी देहांत हुआ। उन्होंने तत्कालीन अनेक राजनेताओं को प्रभावित किया। भारतीय जनता पार्टी की नेता उमा भारती तो उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानती थीं। उ.प्र. के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने उनके गांव में उनकी मूर्ति स्थापित की है। उनके गांव का नाम बदल कर स्वामी ब्रह्मानंद धाम तथा स्थानीय विरमा नदी पर बने मौदहा बांध का नाम स्वामी ब्रह्मानंद बांध किया गया है। 13 सितम्बर, 1997 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में दो रु. का एक डाक टिकट जारी किया। शिक्षा और गोरक्षा के लिए समर्पित ऐसे संत प्रणम्य हैं। 
(विकी/हिन्दू विश्व, 1.10.2020, अमित राजपूत)
----------------------------------

4 दिसम्बर/जन्म-दिवस

नव दधीचि नाना भागवत

बिहार में पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और फिर विश्व हिन्दू परिषद के कार्य विस्तार में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले दत्तात्रेय बालकृष्ण (नाना) भागवत का जन्म वर्धा (महाराष्ट्र) में चार दिसम्बर, 1923 को हुआ था। छात्र जीवन में ही ये संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार के सम्पर्क में आ गये। तब से ही संघ कार्य को इन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।

एक बार ये कुछ मित्रों के साथ डा. जी से मिलने गये। वहाँ जब चाय की बात चली, तो इन्होंने कहा कि मैं चाय नहीं पीता हूँ। इस पर डा. हेडगेवार ने समझाया कि जिससे मिलने जाते हैं, वहाँ चाय के बहाने कुछ देर बैठना हो जाता है। फिर इस बीच संघ की बात चल पड़ती है। अतः संगठन करने वालों को चाय न पीने का दुराग्रह नहीं करना चाहिए। 

1944 में बी.एस-सी. की शिक्षा पूर्ण कर नाना भागवत प्रचारक बने। तब तक वे संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण भी कर चुके थे। श्री गुरुजी ने उन्हें  सर्वप्रथम कर्नाटक भेजा। दो वर्ष वहाँ रहने के बाद 1946 में उनकी योजना बिहार के लिए हुई। इसके बाद लगभग 40 वर्ष वे बिहार में ही रहे।

बिहार में छपरा जिला प्रचारक के रूप में उन्होंने काम प्रारम्भ किया। भिन्न भाषा, खानपान और परिवेश के बीच काम करना कठिन था; पर नाना भागवत भी जीवट के व्यक्ति थे। जहाँ भी वे रहे, वहाँ संघ की भरपूर फसल उन्होंने उगायी। बिहार में अनेक स्थानों पर वे जिला एवं विभाग प्रचारक रहे। 

1975 में जब इन्दिरा गांधी ने देश में आपातकाल थोपकर संघ पर प्रतिबन्ध लगाया, तब वे दरभंगा में विभाग प्रचारक थे। 1977 में आपातकाल तथा प्रतिबन्ध की समाप्ति के बाद 'विश्व हिन्दू परिषद' के कार्य के महत्व को देखते हुए उन्हें बिहार का संगठन मन्त्री बनाया गया। नाना भागवत ने बिहार का सघन प्रवास कर विश्व हिन्दू परिषद की इकाइयाँ खड़ी कीं। 

उनके संगठन कौशल को देखकर 1980 में उन्हें माधवराव देशमुख के साथ बिहार और उत्तर प्रदेश का सह क्षेत्रीय संगठन मन्त्री बनाया गया। कुछ समय बाद उनका कार्यक्षेत्र बंगाल, उड़ीसा और समस्त पूर्वोत्तर भारत तक बढ़ा दिया गया। इस क्षेत्र में जहां एक ओर संघ का काम काफी कम था, वहां दूसरी ओर मिशनरियों की गतिविधियां जोरों पर थीं। बंगलादेश से हो रही घुसपैठ से भी यही क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित था। ऐसे में नाना ने अपने परिश्रम से सर्वत्र विश्व हिन्दू परिषद का काम खड़ा किया।

किसी भी काम को बहुत व्यवस्थित ढंग से करना नाना भागवत के स्वभाव में था। 1985-86 में उन्हें वि.हि.प. के केन्द्रीय मन्त्री का दायित्व देकर दिल्ली केन्द्रीय कार्यालय पर बुला लिया गया। उन्होंने पंजाब में आतंक के दिनों में निकाली गयी 'सद्भावना यात्रा' का सुन्दर समायोजन किया। 

इससे पूर्व 'प्रथम एकात्मता यात्रा' में नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर से चली यात्रा के संयोजक भी वही थे। इस यात्रा से ही विश्व हिन्दू परिषद का देशव्यापी संजाल बना और श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की भूमिका बनी। आगे चलकर जब अयोध्या में श्रीराम मन्दिर निर्माण का आन्दोलन चला, तो 'शिलापूजन कार्यक्रम' की पूरी व्यवस्था उन्होंने ही सँभाली।  

नाना भागवत संघ के जीवनव्रती प्रचारक थे। उनके पास निजी सम्पत्ति तो कुछ थी नहीं; पर 16 जून, 2002 को उन्होंने अपने शरीर को भी चिकित्सा विज्ञान के छात्रों को देने की घोषणा की। देहदान के ऐसे उदाहरण देखने में कम ही मिलते हैं। 19 दिसम्बर, 2006 को दिल्ली में ही उनका देहान्त हुआ। उनकी इच्छानुसार उनका पार्थिव शरीर चिकित्सा महाविद्यालय को दे दिया गया। 

केवल जीवन में ही नहीं, तो जीवन के बाद भी समाज के लिए सर्वस्व अर्पण करने वाले ऐसे नवदधीचि स्तुत्य हैं।
....................................

4 दिसम्बर/जन्म-दिवस

राष्ट्रधर्म के सम्पादक आनन्द मिश्र ‘अभय’

उ.प्र. की राजधानी लखनऊ से प्रकाशित हो रही मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ का प्रकाशन रक्षाबन्धन (31.8.1947) से प्रारम्भ हुआ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उ.प्र. के तत्कालीन प्रांत प्रचारक श्री भाऊराव देवरस तथा सह प्रान्त प्रचारक श्री दीनदयाल उपाध्याय ने इसके लिए ‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड’ की स्थापना की थी। ‘राष्ट्रधर्म’ के प्रथम सम्पादक थे श्री अटल बिहारी वाजपेयी और श्री राजीवलोचन अग्निहोत्री। अटल जी आगे चलकर देश के प्रधानमन्त्री बने। ‘राष्ट्रधर्म’ को श्री रामशंकर अग्निहोत्री, श्री भानुप्रताप शुक्ल, श्री वचनेश त्रिपाठी, श्री वीरेश्वर द्विवेदी जैसे यशस्वी सम्पादकों का साथ मिला। इसी कड़ी में एक थे श्री आनन्द मिश्र ‘अभय’। 
अभय जी का जन्म ग्राम सहजनपुर (हरदोई, उ.प्र.) में चार दिसम्बर, 1931 को देश, धर्म एवं साहित्य के प्रेमी श्री रामनारायण मिश्र ‘विशारद’ तथा श्रीमती रामदेवी के घर में हुआ था। बी.ए. तथा ‘साहित्य रत्न’ की शिक्षा पाकर वे सरकारी सेवा में आ गये तथा प्रदेश शासन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाते हुए 31 दिसम्बर, 1989 को वरिष्ठ पी.सी.एस. अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए। लेखन में रुचि होने के कारण वे लखनऊ के ‘विश्व संवाद केन्द्र’ से जुड़ गये। 1997 में उन्हें राष्ट्रधर्म के सम्पादन का गुरुतर दायित्व दिया गया।
अभय जी का ननिहाल कट्टर आर्यसमाजी था, जबकि पिताजी सनातनी विचारों के मानने वाले थे। अतः उन्हें हिन्दू धर्म की सभी प्रमुख धाराओं को समझने का अवसर मिला। पिता जी हिन्दी, उर्दू, संस्कृत एवं फारसी के विद्वान थे। वे 35 वर्ष तक लगातार एक ही विद्यालय में प्रधानाचार्य रहे। इस दौरान उन्होंने कभी प्रोन्नति नहीं ली; क्योंकि इससे होने वाले स्थानान्तरण से उन्हें अपने वयोवृद्ध पिता जी की सेवा से वंचित रहना पड़ता। वे 15 वर्ष तक मासिक पत्रिका ‘शिक्षा सुधा’ और ‘शिक्षक बन्धु’ के सम्पादक रहे। अतः अभय जी को अध्ययन, लेखन व सम्पादन की कला घुट्टी में ही प्राप्त हुई।
सरकारी सेवा में उन्हें कई जगह रहने का अवसर मिला। साथ में पत्नी तथा पांच बच्चों का परिवार भी था। यदि वे चाहते, तो इस दौरान बहुत धन बटोर सकते थे; पर वे अनैतिक साधनों से सदा दूर रहे। उनका एक ही शौक था, अच्छी पुस्तकें खरीदना और पढ़ना। उनके घर में 5,000 से भी अधिक पुस्तकों का एक समृद्ध पुस्तकालय है, जिसकी सब पुस्तकें उन्हें हृदयगंम थीं।
अभय जी को हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी तथा उर्दू का अच्छा ज्ञान था। सम्पादन करते समय कोई तथ्य गलत न चला जाये, इसका वे विशेष ध्यान रखते थे। देश-धर्म पर हो रहे हमलों और हिन्दुओं की उदासीनता से वे बहुत खिन्न रहते थे। अपने लेखों में वे इसके बारे में बहुत उग्रता से लिखते थे। वर्तमान चुनाव प्रणाली को वे अधिकांश समस्याओं की जड़ मानते थे। उनके लेखन एवं सम्पादन से समृद्ध साहित्य में हमारे दिग्विजयी पूर्वज, हमारे वैज्ञानिक, समय के हस्ताक्षर, शिवा बावनी, विश्वव्यापी हिन्दू संस्कृति, राष्ट्रधर्म के पथ पर, श्रीराम सेतु आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कविता, कहानी, व्यंग्य, निबन्ध आदि विधाओं में प्रचुर लेखन किया, जो अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ है।
अभय जी ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान’ के अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहे। 2003 में साहित्य मंडल (श्रीनाथद्वारा, राजस्थान) ने उन्हें ‘सम्पादक शिरोमणि’ की उपाधि दी। श्री छोटीखाटू पुस्तकालय (राजस्थान) से 2007 में ‘दीनदयाल स्मृति सम्मान’ प्राप्त हुआ। वर्ष 2011 में म.प्र. शासन ने भी उन्हें सम्मानित किया। शारीरिक और मानसिक कष्टों के बीच भी दृढ़ रहते हुए उन्होंने 2016 तक ‘राष्ट्रधर्म’ का सम्पादन किया। 28 मार्च, 2024 को वृद्धावस्था के कारण परिजनों के बीच बाराबंकी में घर पर ही उनका देहांत हुआ। 
.........................

5 दिसम्बर/जन्म-दिवस

ओजपूर्ण व्यक्तित्व रंगा हरि

संघ के वरिष्ठ प्रचारक रंगा हरि का जन्म पांच दिसम्बर, 1930 को केरल में कोच्चि के पास त्रिपुन्थरा गांव में हुआ था। 13 वर्ष की अवस्था में वे शाखा जाने लगे थे। 1948 में संघ पर लगे प्रतिबंध के विरोध में सत्याग्रह कर वे पांच महीने कन्नूर जेल में बंद रहे। स्नातक करने के बाद वे प्रचारक बने।

अपनी प्रचारक यात्रा में विभिन्न दायित्व निभाते हुए हरि जी 1983 में केरल के प्रांत प्रचारक, 1990 में अ.भा.सहबौद्धिक प्रमुख तथा 1991 से 2005 तक अ.भा.बौद्धिक प्रमुख रहे। एशिया और आस्टेªलिया में संघ कार्य के प्रभारी के नाते वे वहां प्रवास पर भी गये। 75 वर्ष के होने पर उन्होंने प्रत्यक्ष दायित्व से मुक्ति ले ली। फिर भी अगले 15 वर्ष तक वे प्रवास करते रहे। उनके भाषण और वार्तालाप की शैली इतनी रोचक थी कि बच्चे और बड़े ब उन्हें घेरे रहते थे। हंसते-हंसते गंभीर संदेश देने की उनकी शैली अद्भुत थी।

केरल में ईसाई, मुस्लिम और कम्यूनिस्ट तीनों संघ को समूल नष्ट करने में लगे रहते हैं। एक समय वहां हिन्दुओं का मनोबल बहुत गिरा हुआ था। केरल के प्रांत प्रचारक भास्करराव ने प्रयासपूर्वक इस माहौल को बदला और हिन्दुओं को ईंट का जवाब पत्थर से देने वाला बनाया। भास्करराव के बाद हरि जी ने इसी नीति को आगे बढ़ाया। इस संघर्ष में सैकड़ों स्वयंसेवक मारे गये। अनेक कार्यकर्ताओं को आजीवन कारावास हुआ; लेकिन दिल पर पत्थर रखकर संघ ने इसे सहन किया। इनकी चर्चा से ही हरि जी की आंखें भीग जाती थीं।

केरल के खानपान में मछली सामान्य चीज है; पर वे वैष्णव परिवार से थे। अतः कई बार उन्हें दही-भात ही खाना पड़ता था। हरि जी को केरल में उनके संगठन कौशल के लिए जाना जाता है; पर देश भर में उनकी पहचान एक प्रबुद्ध वक्ता, लेखक तथा बौद्धिक योद्धा की थी। उनकी कई भाषाओं में लिखित और अनुवादित 62 पुस्तकें हैं। श्री गुरुजी की जन्मशती पर नागपुर में रहकर उन्होंने श्री गुरुजी समग्र को 12 खंडों में प्रकाशित करवाया।

वे नये लेखकों को बहुत प्रोत्साहित करते थे। एक बार का पढ़ा हुआ उन्हें संदर्भ सहित याद रहता था। मलयालम उनकी मातृभाषा थी; पर भाषा सीखने की रुचि के कारण वे हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, तमिल, कोंकणी, मराठी, गुजराती, बंगला और असमी भी समझ और बोल लेते थे। देहांत से कुछ दिन पूर्व ही उनकी पुस्तक पृथ्वी सूक्तप्रकाशित हुई थी। केरल में केवल संघ ही नहीं, तो अन्य विचारों के लोग भी उनका आदर करते थे। संघ से इतर अन्य सामाजिक कामों को उनका समर्थन तथा सहयोग रहता था। इन दिनों प्रवास से विश्राम लेकर वे कोच्चि के संघ कार्यालय पर रह रहे थे। 29 अक्तूबर, 2023 को कोच्चि में ही उनका देहांत हुआ।

केरल में विभिन्न जातियों के अलग शमशान होते हैं; पर उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका दाह संस्कार सार्वजनिक शमशान (आइवरम मठम) में हुआ। कहते हैं कि पांडवों ने अपने पूर्वजों का पिंडदान वहां किया था। उनकी अस्थियां भी किसी तीर्थ की बजाय पास के जलाशय में ही विसर्जित की गयीं। वे ब्रह्मकपाल में अपना श्राद्ध एवं पिंडदान कर चुके थे, जिससे किसी पर कोई बंधन न रहे। केरल में वामपंथी नेताओं का लाल कपड़े में अग्निदाह किया जाता है। इसकी देखादेखी कई स्वयंसेवकों का दाह संस्कार भगवा कपड़े में होने लगा। हरि जी ने भगवे रंग को पवित्र बताते हुए इसके लिए मना किया था।

उन्होंने तीन संस्कृत श्लोकों में अपने जीवन को धन्य मानते हुए भगवान से प्रार्थना की थी कि अगले जीवन में भी उन्हें अपने साथियों के साथ यही संघ कार्य करने का अवसर दे। एक श्रेष्ठ लेखक, ओजस्वी वक्ता और मौलिक चिंतक के नाते वे सदा याद रखे जाएंगे।

(संदर्भ: देहांत के बाद पांचजन्य, आर्गनाइजर, स्वदेश, विकी.. आदि)

...............................

6 दिसम्बर/इतिहास-स्मृति

बाबरी ढांचे का ध्वंस

भारत में विदेशी और विधर्मी हमलावरों ने बड़ी संख्या में हिन्दू मन्दिरों का विध्वंस कर अपने पूजा स्थल बना लिये। स्वतन्त्रता के बाद के शासन ने भी इन्हें बना रहने दिया। इनमें से श्रीराम जन्मभूमि (अयोध्या), श्रीकृष्ण जन्मभूमि (मथुरा) और काशी विश्वनाथ मन्दिर के सीने पर बनी मस्जिदें सदा से हिन्दुओं को उद्वेलित करती रही हैं। इनमें से श्रीराम मन्दिर के लिए विश्व हिन्दू परिषद् ने देशव्यापी आन्दोलन किया, जिससे छह दिसम्बर, 1992 को वह बाबरी ढाँचा धराशायी हो गया।
अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर को बाबर के आदेश से उसके सेनापति मीर बाकी ने 1528 ई. मंे गिराकर वहाँ एक मस्जिद बना दी। इसके बाद से हिन्दू समाज एक दिन भी चुप नहीं बैठा। वह लगातार इस स्थान को पाने के लिए संघर्ष करता रहा। 23 दिसम्बर, 1949 को हिन्दुओं ने वहाँ रामलला की मूर्ति स्थापित कर पूजन एवं अखंड कीर्तन शुरू कर दिया। विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा इस विषय को अपने हाथ में लेने से पूर्व तक 76 हमले हिन्दुओं ने किये; जिसमें देश के हर भाग से तीन लाख से अधिक नर नारियों का बलिदान हुआ; पर पूर्ण सफलता उन्हें कभी नहीं मिल पायी।
विश्व हिन्दू परिषद ने लोकतान्त्रिक रीति से जनजागृति के लिए ‘श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति’ का गठन कर 1984 में ‘श्री रामजानकी रथयात्रा’ निकाली, जो सीतामढ़ी से चलकर अयोध्या पहुँची। इसके बाद हिन्दू नेताओं ने शासन से कहा कि मन्दिर पर लगा ताला खोला जाए। न्यायालय के आदेश से एक फरवरी, 1986 को ताला खुल गया। इसके बाद मन्दिर के लिए 1989 में देश भर से श्रीराम शिलाओं का पूजन कर अयोध्या लाया गया। नौ और दस नवम्बर, 1989 को पूरे विधि विधान से श्रीराम मन्दिर का शिलान्यास हो गया। जनता के दबाव के आगे प्रदेश और केन्द्र शासन को झुकना पड़ा।
पर मन्दिर निर्माण तब तक सम्भव नहीं था, जब तक वह ढांँचा न हटे। हिन्दू नेताओं ने कहा कि यदि मुसलमानों को इस ढाँचे से मोह है, तो वैज्ञानिक विधि से इसे स्थानान्तरित कर दिया जाए; पर शासन उनके वोटों के लालच से बँधा था। वह हर बार न्यायालय की दुहाई देता रहा। वि.हि.प का तर्क था कि आस्था के विषय का निर्णय न्यायालय नहीं कर सकता। शासन की हठधर्मी देखकर हिन्दू समाज ने आन्दोलन और तीव्र कर दिया।
इसके अन्तर्गत 1990 में वहाँ कारसेवा का निर्णय किया गया। तब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार थी। उन्होेंने घोषणा कर दी कि बाबरी परिसर में एक परिन्दा तक पर नहीं मार सकता; पर हिन्दू युवकों ने शौर्य दिखाते हुए 29 अक्तूबर को गुम्बदों पर भगवा फहरा दिया। बौखला कर दो नवम्बर को मुलायम सिंह ने गोली चलवा दी, जिसमें कोलकाता के दो सगे भाई राम और शरद कोठारी सहित सैकड़ों कारसेवकों का बलिदान हुआ।
इसके बाद प्रदेश में भा.ज.पा की सरकार बनी। एक बार फिर छह दिसम्बर, 1992 को कारसेवा की तिथि निश्चित की गयी। वि.हि.प की योजना केन्द्र शासन पर दबाव बनाने की थी, जिससे न्यायालय शीघ्र निर्णय दे। पर शासन को टालमटोल करता देख युवक आक्रोशित हो उठे। उन्होंने वहाँ लगी तार बाड़ के खम्भों से प्रहार कर बाबरी ढाँचे के तीनों गुम्बद गिरा दिये। इसके बाद विधिवत वहाँ श्री रामलला को भी विराजित कर दिया गया।
इस प्रकार वह बाबरी ढांचा नष्ट हुआ और तुलसी बाबा की यह उक्ति भी प्रमाणित हुई - होई है सोई, जो राम रचि राखा। अब वहां सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से मंदिर बन रहा है। 22 जनवरी, 2024 को उसमें श्रीरामलला के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा भी हो गयी है।
..............................


7 दिसम्बर/जन्म-दिवस

उच्च मनोबल के धनी डा. अन्ना साहब देशपांडे

डा. अन्ना साहब देशपांडे संघ के प्रारम्भिक कार्यकर्ताओं में से एक थे। उनका जन्म सात दिसम्बर, 1890 को वर्धा जिले के आष्टी गांव में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा नागपुर में होने से उनकी मित्रता डा. हेडगेवार से हो गयी। उनकी भव्य कद-काठी और बोलने की शैली भी डा. जी से काफी मिलती थी। 

नागपुर के बाद वे अमरावती चले गये। वहां से इंटर साइंस करने के बाद उन्होंने मुंबई से एम.बी.बी.एस. की उपाधि ली। इस प्रकार प्रशिक्षित चिकित्सक बनकर उन्होंने अमरावती जिले के परतवाड़ा में अपना चिकित्सा कार्य प्रारम्भ किया। चार वर्ष बाद उन्होंने आर्वी को अपना निवास बनाया। जब डा. जी ने संघ की स्थापना की, तो अन्ना साहब पूर्ण निष्ठा से उनके साथ जुड़ गये।

अन्ना साहब ने चिकित्सा कार्य करते हुए भरपूर यश अर्जित किया। चिकित्सा करते समय वे गरीबों के साथ विशेष सहानुभूति का व्यवहार करते थे। उन्हें प्रायः दूर-दूर के गांवों में मरीज देखने जाना पड़ता था; पर उन्होंने कभी इसके लिए अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया। संघ के सक्रिय कार्यकर्ता होने के बाद भी स्थानीय मुसलमानों का सर्वाधिक विश्वास उन्हीं पर था।

अन्ना साहब संघ के साथ ही कांग्रेस तथा अन्य सामाजिक कार्यों में भी पर्याप्त रुचि लेते थे। आर्वी में उन्होंने एक बालिका विद्यालय की स्थापना की। 1928 से 30 तक वे स्थानीय बोर्ड के अध्यक्ष रहे। गांधी जी के आह्नान पर जंगल सत्याग्रह और फिर नमक सत्याग्रह में भाग लेकर वे जेल गये। 1948 में जब संघ पर प्रतिबंध लगा, तब भी उन्होंने जेल यात्रा की।

शाखा वृद्धि के लिए अन्ना साहब का प्रवास पर बहुत जोर रहता था। वृद्ध होने पर जब कोई उन्हें अब प्रवास न करने को कहता, तो वे जवाब देते थे कि मुझे यह सब करने दीजिये। इससे मैं कुछ और समय तक जीवित रह सकूंगा। प्रवास में वे अपना सामान किसी दूसरे को नहीं उठाने देते थे। 

उन पर विभाग संघचालक की जिम्मेदारी थी। किसी शिविर या बैठक आदि में उनके बुजुर्ग तथा संघचालक होने के नाते ठहरने की व्यवस्था यदि अलग की जाती थी, तो वे कहते थे कि आप मुझे सब लोगों से दूर क्यों रखना चाहते हैं ? मैं सबके साथ ही ठीक हूं। अन्ना साहब का मनोबल बहुत ऊंचा था। उनका मत था कि हमें हर परिस्थिति में संघ कार्य करते रहना चाहिए। 

1960 में आर्वी में लगे संघ शिक्षा वर्ग में वे सर्वाधिकारी थे। इस बीच चोरों ने उनके घर में सेंध लगाकर 35,000 रु. चुरा लिये। इसका मूल्य आजकल संभवतः 35 लाख रुपये के बराबर होगा। यह उनकी न जाने कितने वर्ष की बचत थी; पर स्थितप्रज्ञ अन्ना साहब यह कहकर फिर काम में लग गये कि अच्छा हुआ, भगवान ने दीवाला निकालकर सब झंझटों से मुक्त कर दिया। 

एक बार संपूर्ण विदर्भ प्रांत का बड़ा सम्मेलन हो रहा था। 10,000 स्वयंसेवक आये थे। संघचालकों के आवास के पास आधा खुदा हुआ एक कुआं था। वे उसमें गिर गये। कुएं में पानी बहुत कम था। लोगों ने उन्हें बाहर निकाला, तो उनकी पीठ पर काफी चोट लगी थी। उन्होंने वहां दवा लगाई और गणवेश पहन कर संघस्थान पर चले गये। यह समाचार मिलते ही श्री गुरुजी उन्हें देखने आये, तो पता लगा कि अन्ना साहब तो शाखा पर गये हैं।

एक बार जिस बैलगाड़ी पर वे यात्रा कर रहे थे, वह उलट गयी; पर चोट ठीक होते ही वे फिर प्रवास करने लगे। अंतिम सांस तक सक्रिय रहते हुए अन्ना साहब ने 25 नवम्बर, 1974 को अंतिम सांस ली।

(संदर्भ : साप्ताहिक विवेक, मुंबई द्वारा प्रकाशित संघ गंगोत्री)

3 टिप्‍पणियां:

  1. विजय जी अच्छा प्रयास है......
    मेरे ब्लॉग भी देखे......
    http://harvilas.blogspot.in/

    http://hvgupta.blogspot.in/

    जवाब देंहटाएं
  2. Sitaramji goel, father in law of my real elder brother, was expired on 3rd December and not 2nd!
    Just a correction! Dinesh Kumar🙏🏾

    जवाब देंहटाएं
  3. 🙏विजयजी गुम्बदों पर भगवा ३० अक्टूबर को फहराया गया था, कृपया ठीक करें, धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं