आजाद हिन्द फौज के सेनानी मेजर दुर्गामल्ल
मेजर दुर्गामल्ल का जन्म डोइवाला (देहरादून) में एक जुलाई, 1913 को गोरखा राइफल्स में नायब सूबेदार गंगाराम एवं पार्वती देवी मल्ल के घर में हुआ था। यहां भारतीय सेना से अवकाश प्राप्त नेपाली मूल के गोरखा लोग बड़ी संख्या में बसे हैं। आज भी गोरखाली युवाओं की प्राथमिकता सेना ही होती है। एक बार फील्ड मार्शल मानेकशाॅ ने कहा था कि यदि कोई कहे कि मैं मौत से नहीं डरता, तो या तो वो झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है।
दुर्गामल्ल की पढ़ाई गोरखा मिडिल स्कूल में हुई। वे खेलकूद तथा पढ़ाई दोनों में ही आगे रहते थे। कविता तथा नाटक में भी उनकी रुचि थी। वे कविता लिखते भी थे। कक्षा दस में पढ़ते समय स्वाधीनता सेनानी खड़क बहादुर सिंह बिष्ट और रामसिंह ठाकुर से प्रेरित होकर उन्होंने मित्रों के साथ जुलूस निकाला। वे गोरखा पल्टन की दीवारों पर छिपकर पोस्टर भी लगाने लगे। इस पर पुलिस छात्रों को पकड़ने लगी। यह देखकर दुर्गामल्ल के पिता उसे अपने भाई केदार मल्ल के घर ग्राम माग्सू, जिला कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में छोड़ आये।
पर दुर्गामल्ल तो फौज में जाना चाहते थे। अतः 1931 में वे धर्मशाला छावनी में जाकर गोरखा राइफल्स में भरती हो गये। 1941 में उनका विवाह शारदादेवी से हुआ। विवाह के बाद दुर्गामल्ल अपने घर डोइवाला आये ही थे कि मुख्यालय से बुलावा आ गया। उनके विवाह को केवल नौ दिन ही हुए थे; पर दुर्गामल्ल सैन्य अनुशासन का पालन करते हुए तुरंत चल दिये।
उन दिनों द्वितीय विश्व युद्ध का दूसरा चरण चल रहा था। दुर्गामल्ल को सिंगापुर और फिर मलाया भेज दिया गया। वहां जापान से लड़ते हुए वे और उनके सैकड़ों साथी बंदी बना लिये गये। उन्हीं दिनों आजाद हिन्द फौज का गठन हुआ था। सुभाष चंद्र बोस जापान का सहयोग लेकर भारत से अंग्रेजों को निकालना चाहते थे। अतः उनसे सहानुभूति रखने वाले सैनिकों को जापान ने मुक्त कर आजाद हिन्द फौज में भेज दिया।
दुर्गामल्ल की योग्यता देखकर उन्हें मेजर पद तथा गुप्तचर विभाग में काम दिया गया। वे गुप्त सूचनाएं रंगून मुख्यालय में भेजते थे। आजाद हिन्द फौज आगे बढ़ रही थी; पर युद्ध में जीत के साथ हार भी लगी ही रहती है। 27 मार्च, 1944 को माशीपुर अखरूल (कोहिमा) में ब्रिटिश सेना ने उन्हें पकड़ लिया और युद्धबंदी के रूप में दिल्ली के लालकिले में बंद कर दिया।
यहां सैन्य न्यायालय में मेजर दुर्गामल्ल का कोर्ट मार्शल हुआ। गोरखा राइफल्स के सैनिक होते हुए भी वे आजाद हिन्द फौज में शामिल होकर ब्रिटिश फौज से ही लड़े थे। अतः उन पर धारा 121 के अन्तर्गत मुकदमा चलाया गया। उन पर कई बार क्षमा मांगने के लिए दबाव डाला गया; पर उन्होंने झुकना नहीं सीखा था। ऐसे व्यक्ति के लिए ब्रिटिश कानून में मृत्युदंड ही लिखा था।
यह सुनते ही दुर्गामल्ल के घर में हाहाकार मच गया। उनकी पत्नी और परिजनों को अंतिम भेंट के लिए दिल्ली लाया गया। पत्नी उन्हें देखकर बेहोश हो गयी; पर दुर्गामल्ल ने उन्हें संभाला और साहस दिया। अंग्रेज सोचते थे कि युवा पत्नी उन्हें माफी के लिए तैयार कर लेगी; पर दुर्गामल्ल के तकिये के पास ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ रखी थी। इससे स्पष्ट होता था कि वे मृत्यु के लिए तैयार थे। 25 अगस्त, 1944 को उन्हें दिल्ली के केन्द्रीय कारागार में फांसी दी गयी। वे यह गौरव पाने वाले आजाद हिन्द फौज के पहले गोरखा सेनानी थे।
यहां पति के साथ केवल नौ दिन बिताने वाली शारदादेवी का त्याग भी अनुकरणीय है। वे इंटरमीडियेट तक पढ़ी थीं। उन्होंने पुनर्विवाह न करते हुए स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और फिर जीवन भर बच्चों को पढ़ाती रहीं। मेजर दुर्गामल्ल की स्मृति में डोइवाला में एक डिग्री काॅलिज बनाया गया है तथा उन पर पांच रु. का डाक टिकट भी जारी किया गया है।
(विकी तथा उत्तराखंड स्वराज/239, डा.एस.के कुडि़याल तथा जसप्रीत कौर)
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25 अगस्त/जन्म-दिवस
संघव्रती प्रचारक बाबूराव देसाई
संघ और फिर विश्व हिन्दू परिषद में अंतिम सांस तक कार्यरत वरिष्ठ प्रचारक बाबूराव देसाई का जन्म 25 अगस्त, 1925 को गोवा में हुआ था। उनका पूरा नाम रघुनाथ नारायणराव प्रभु देसाई था। उनके पिता श्री नारायणराव प्रभु देसाई फल बेचकर अपने परिवार का भरण पोषण करते थे।
बाबूराव शुरू से ही मेधावी होने के कारण स्वर्ण पदक एवं छात्रवृत्तियां पाते रहे। छात्र जीवन में वे स्वाधीनता आंदोलन में भी सक्रिय रहे। स्नातक परीक्षा में उन्होंने कला और अंग्रेजी में विशेष उपाधि प्राप्त की। इसके साथ वे कोंकणी, मराठी, हिन्दी, कन्नड़, पुर्तगाली तथा फ्रेंच भाषा भी बोल लेते थे। उनका कार्यक्षेत्र मुख्यतः दक्षिण भारत रहा। अतः वे दक्षिण की अन्य भाषाएं भी समझ लेते थे। वे सादगी, संयम और प्रसन्नता की प्रतिमूर्ति थे।
मृदुभाषी बाबूराव 1942 में स्वयंसेवक तथा 1949 में प्रचारक बने। सर्वश्री यादवराव जोशी, जगन्नाथराव जोशी, भाउराव देवरस, बाबूराव देशपांडे तथा सदानंद काकड़े आदि वरिष्ठ प्रचारक उनके प्रेरणास्रोत थे। उनके प्रचारक जीवन की यात्रा वर्तमान कर्नाटक के करवाड़ नगर से शुरू हुई। इसके बाद वे धारवाड़, बेलगांव, गुलबर्गा, बेल्लारी आदि में जिला और विभाग प्रचारक रहे। 1971 में सरसंघचालक श्री गुरुजी स्वास्थ्य लाभ के लिए 35 दिन तक कर्नाटक के सिरसी नगर में रहे। वहां उनकी देखभाल के लिए बाबूराव भी साथ रहे। वे दिन बाबूराव अपने जीवन के स्वर्णिम दिन मानते थे।
कांग्रेस सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर 1948 तथा 1975 में प्रतिबंध लगाया। दोनों बार बाबूराव ने सहर्ष जेलयात्रा की। 1975 में तो उन्हें ‘मीसा’ में बंद किया गया। अतः वे प्रतिबंध की समाप्ति पर ही जेल से बाहर आये। 1980 के दशक में जब विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से राम मंदिर आंदोलन का शंखनाद हुआ, तो अनेक वरिष्ठ प्रचारक इसमें लगाये गये। बाबूराव भी उनमें से एक थे। 1983 में वे कर्नाटक प्रांत के संगठन मंत्री बनाये गये। कुछ समय बाद उन्हें संपूर्ण दक्षिण भारत का काम दिया गया। उस दौरान हुए आंदोलनों में वहां से भी बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और कारसेवक अयोध्या आते थे।
दक्षिण भारत में संघ और विश्व हिन्दू परिषद को प्रायः उत्तर भारत की उच्च जातियों तथा हिन्दीभाषियों की संस्था माना जाता था। अनेक राजनेता भी भाषण में यही बोलते थे। ऐसे में विनम्र स्वभाव के बाबूराव ने सभी मत, पंथ, जाति और बिरादरी के संतों से संपर्क किया। उन्होंने सभी मठ, आश्रम और मंदिरों के धर्माचार्यों से अच्छे संबंध बनाये। कई जगह उनका अपमान और उपेक्षा भी हुई, पर वे स्थितप्रज्ञ की तरह शांत रहते थे। इससे वातावरण बदला और हिन्दुत्व और मंदिर आंदोलन की लहर चल पड़ी। बाबरी ढांचे के ध्वंस के बाद वि.हि.प. पर प्रतिबंध लगाया गया। उस समय बाबूराव के प्रयास से दक्षिण में भी इसका प्रबल विरोध हुआ।
बाबूराव की संगठन क्षमता देखकर संगठन ने उन्हें विश्व हिन्दू परिषद में केन्द्रीय मंत्री की जिम्मेदारी दी। इस नाते उन्होंने मंदिर आंदोलन के साथ ही गोरक्षा, परावर्तन तथा एकल विद्यालय के अभियान में विशेष योगदान दिया। वे किसी भी समस्या का समाधान सरल उदाहरण देकर आसानी से कर देते थे। आयुवृद्धि के कारण उनका काम हल्का कर उन्हें केन्द्रीय प्रबंध समिति का सदस्य बनाया गया। इस नाते उनके अनुभव का लाभ सबको मिलता था। मंगलुरू में उनका नागरिक अभिनंदन भी किया गया था।
22 जनवरी, 2021 को 96 वर्ष की परिपूर्ण आयु में बंगलुरू में उनका देहांत हुआ। भगवान पर अटूट श्रद्धा रखने वाले बाबूराव ने देश की आजादी तथा फिर राममंदिर को अपनी पूर्णता पर पहुंचते हुए देखा। इन दोनों को वे अपने जीवन और भारतीय इतिहास की सर्वाधिक परिवर्तनकारी घटना मानते थे।
(हि.वि. 16.2.21, विनोद बंसल तथा पटना से गौरव अग्रवाल)
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25 अगस्त/जन्म-दिवसहिन्दुत्व के व्याख्याकार तनसुखराम गुप्त
तनसुखराम जी 1939 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आये। शाखा जाने से उनके मन में देशभक्ति के संस्कार और प्रबल हो गये। 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण उन्हें विद्यालय से निकाल दिया गया; पर एक सहृदय अध्यापक के कहने से फिर प्रवेश मिल गया।
1943 में पिताजी के देहांत से परिवार के पालन का भार उनके सिर पर आ गया। अतः उन्होंने प्रथम श्रेणी में हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण कर नियमित पढ़ाई को विराम दे दिया और दिल्ली नगरपालिका में लिपिक बन गये। 1946 में विवाह के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और स्कूल सामग्री तथा अन्य दैनिक उपयोगी वस्तुओं की दुकान खोल ली। कुछ समय बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान पुस्तक बिक्री और फिर पुस्तक प्रकाशन पर ही केन्द्रित कर लिया।
पुस्तक और प्रकाशन व्यवसाय में लगे व्यक्ति में साहित्य सृजन के प्रति प्रायः अनुराग होता ही है। अतः तनसुखराम जी ने कहानी लेखन के माध्यम से इस क्षेत्र में प्रवेश किया। 1946 में उनका पहला कहानी संग्रह ‘तीन कहानियां’ प्रकाशित हुआ। उनकी कहानियां मुख्यतः देश, धर्म और समाज के प्रति त्याग व समर्पण की प्रेरणा देती थीं। इसके बाद मेरा रंग दे बसंती चोला, नैतिक कथाएं तथा कई अन्य कहानी संग्रह भी प्रकाशित और लोकप्रिय हुए।
तनसुखराम जी को पारिवारिक कारणों से नियमित पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी; पर उनकी पढ़ने की इच्छा बनी हुई थी। अतः निजी रूप से अध्ययन करते हुए उन्होंने संस्कृत की ‘विशारद’ और ‘प्रभाकर’ परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं। अध्ययन और चिंतन-मनन का दायरा बढ़ने के कारण अब वे कहानी के साथ निबन्ध भी लिखने लगे और 361 निबन्धों की पुस्तक ‘निबन्ध सौरभ’ प्रकाशित की।
जीवन की यात्रा में पग-पग पर ऐसे लोग मिलते हैं, जो किसी न किसी कारण से मन-मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ देते हैं। तनसुखराम जी ने ऐसे लोगों के साथ अपने संस्मरणों को तीन पुस्तकों में संकलित किया है। ये हैं - जीवन के कुछ क्षणों में, विस्तृति के भय से तथा संघर्ष के पथ पर। इसके साथ ही दीनदयाल उपाध्याय: महाप्रस्थान, लाल बहादुर शास्त्री: महाप्रयाण तथा रग-रग हिन्दू मेरा परिचय उनकी अन्य प्रसिद्ध पुस्तकें हैं।
तनसुखराम जी ने ‘श्रीरामचरितमानस’ का अध्ययन कर मानस मंथन, वैदेही विवाह तथा श्रीरामचरितमानस भाष्य नामक पुस्तकें लिखीं। इनमें मानस के धार्मिक व आध्यात्मिक पक्ष के साथ ही सामाजिक पक्ष के दर्शन भी होते हैं। उनकी एक अन्य उल्लेखनीय पुस्तक ‘हिन्दू धर्म परिचय’ है, जिसमें हिन्दू मान्यताओं और परम्पराओं की सरल और आधुनिक व्याख्या की गयी है।
तनसुखराम जी हिन्दी काव्य एवं साहित्य के क्षेत्र में वरिष्ठ कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ से बहुत प्रभावित थे। अतः उन्होंने अपने प्रकाशन का नाम ‘सूर्य प्रकाशन’ रखा। यहां से तीन खंडों में प्रकाशित ‘व्यावहारिक हिन्दी व्याकरण कोश’ हिन्दी के अध्येताओं के लिए एक अति उपयोगी ग्रन्थ है।
प्रतिष्ठित प्रकाशन प्रायः नये लेखकों की पुस्तकें नहीं छापते; लेकिन तनसुखराम जी ने दर्जनों नये और युवा लेखकों की पुस्तकें छापकर उन्हें प्रतिष्ठा दिलाई। अपनी लेखनी और प्रकाशन द्वारा हिन्दुत्व की महान सेवा करने वाले श्री तनसुखराम गुप्त का 26 जनवरी, 2004 को दिल्ली में देहांत हुआ।
(संदर्भ : पांचजन्य 15.2.2004)
परिवार के संरक्षक श्री कृष्णप्पा
इन दिनों सब तरफ लोग परिवार में हो रहे विघटन से चिन्तित हैं। पैसा बढ़ा है, पर लोगों के मन गरीब हो गये हैं। तेज वाहनों ने दूरियां घटायी हैं; पर पड़ोसी से सम्बन्ध टूट गये हैं। मोबाइल फोन ने सारी दुनिया को जोड़ा है; पर घरेलू सदस्यों में बात बंद हो गयी है। इसी का परिणाम है तलाक, आत्महत्या और अवसाद जैसे रोग। अनेक सामाजिक संस्थाएं इस बारे में विचार करती रहती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसकी जिम्मेदारी वरिष्ठ प्रचारक श्री कृष्णप्पा को दी। इससे ‘परिवार प्रबोधन’ जैसी अवधारणाएं विकसित हुईं।
मैसूर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (25 अगस्त, 1932) को एक पुरोहित परिवार में जन्म लेने के कारण इनका नाम ‘कृष्णप्पा’ रखा गया। उनसे बड़े एक भाई और भी थे। घोर गरीबी के कारण बचपन में ये एक अनाथालय में भोजन करने जाते थे। वहां इनकी मित्रता एस.एल.भैरप्पा से हुई, जो जीवन भर बनी रही। वे भी वहीं खाना खाते थे। ‘साहित्य अकादमी सम्मान’ प्राप्त श्री भैरप्पा आगे चलकर कन्नड़ के श्रेष्ठ साहित्यकार बने। उनके जीवन में देश, धर्म और समाज के प्रति प्रेम के संस्कार श्री कृष्णप्पा के कारण ही प्रविष्ट हुए।
यद्यपि एक समय श्री कृष्णप्पा शाखा पर पत्थर फेंकते थे; पर 13 वर्ष की अवस्था में वे स्वयंसेवक बने और 1954 में संस्कृत में बी.ए. उत्तीर्ण कर प्रचारक बन गये। उन पर सर्वश्री यादवराव जोशी, हो.वे.शेषाद्रि तथा सूर्यनारायण राव का विशेष प्रभाव रहा। बंगलोर, तुम्कुर, शिमोगा, मंगलूर आदि में जिला और विभाग प्रचारक रहने के बाद वे 1978 में कर्नाटक प्रांत बौद्धिक प्रमुख और फिर 1980 में कर्नाटक प्रांत प्रचारक बने। प्रवास में वे कार्यकर्ताओं के घर पर ही रुकते थे। 1975 में आपातकाल और संघ पर प्रतिबंध के समय वे मंगलौर में विभाग प्रचारक थे। संघ के निर्देश के अनुसार भूमिगत रहकर काम करते हुए एक दिन वे पुलिस की निगाह में आ गये। उन्हें पकड़कर ‘मीसा’ में बंद कर दिया गया। अतः वे आपातकाल की समाप्ति के बाद ही जेल से छूट सके।
1989 में उन्हें क्षेत्र प्रचारक की जिम्मेदारी दी गयी। उनके क्षेत्र में केरल, कर्नाटक तथा तमिलनाडु प्रांत थे। इसके बाद वे दक्षिण क्षेत्र के प्रचारक प्रमुख भी रहे; पर इसी दौरान वे प्रोस्टेट कैंसर के शिकार हो गये। अंग्रेजी चिकित्सकों ने कहा कि वे अधिकतम तीन वर्ष तक जीवित रह सकेंगे; पर कृष्णप्पा जी को आयुर्वेद, होम्योपैथी, पिरामिड, योग व प्राकृतिक चिकित्सा पर पूरा विश्वास था। इनसे उन्होंने स्वयं को ठीक किया और अगले 28 वर्ष तक सक्रिय रहे।
वे बहुत समय से वर्ष में एक बार श्रीरंगपट्टनम में अपने भाई के घर आसपास के नवयुगलों को बुलाते थे। कावेरी में स्नान और पूजा के बाद सहभोज होता था। इससे ही ‘परिवार प्रबोधन’ का विचार विकसित हुआ। 2014 में संघ की ओर से यह काम मिलने पर वे कार्यकर्ताओं के पूरे परिवार के साथ बैठने लगे। परिवार में सुख, शांति, संस्कार और समन्वय बना रहे, इसे ध्यान में रखते हुए उन्होंने एक पुस्तक ‘मंगल भवन अमंगल हारी’ भी लिखी।
वे अध्यात्म और विज्ञान, दोनों में समन्वय बनाकर चलते थे। उनकी रुचि संस्कृत भारती, हिन्दू सेवा प्रतिष्ठान तथा वेद विज्ञान गुरुकुल में भी थी। गुरुकुल में आयुर्वेद, योग, वेद, गोसेवा, जैविक खेती आदि का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है। 10 से 16 वर्ष के छात्र और छात्राओं के लिए अलग-अलग तीन निःशुल्क गुरुकुल कर्नाटक में हैं। इनमें कोई लिखित पाठ्यक्रम नहीं है; पर वार्ता, अभ्यास और अनुभव के आधार पर प्रशिक्षण आगे बढ़ता रहता है।
अनुशासन और सादगीप्रिय श्री कृष्णप्पा का दस अगस्त, 2015 को बंगलौर संघ कार्यालय पर निधन हुआ। प्रबल इच्छशक्ति से कैंसर को हराने वाले इस महान योद्धा को संघ के सह सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होस्बले ने ‘मृत्युमित्र’ कहा है।
(संदर्भ : पांचजन्य 30.8.15/विक्रम 23.8.15)
25 अगस्त/इतिहास-स्मृति
हिमालयी चेतना की प्रतीक ‘सालम क्रांति’
उत्तराखंड में कुमाऊं के
अल्मोड़ा जिले में पनार नदी के दोनों ओर का क्षेत्र सालम पट्टी कहलाता है। पूरे
देश की तरह यहां भी स्वाधीनता के स्वर गूंज रहे थे। आठ अगस्त, 1942 में गांधी जी ने मुंबई में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आह्वान किया। अगले दिन सब बड़े नेता पकड़ लिये गये। उत्तराखंड में गोविंद
वल्लभ पंत को भी गिरफ्तार कर लिया गया। बड़े नेताओं की गिरफ्तारी से आंदोलन
दिशाहीन हो गया। फिर भी कई जगह स्थानीय लोगों ने आंदोलन की कमान अपने हाथ में ले
ली। कुमाऊं में भी ऐसा ही हुआ।
23 जून, 1942 को अल्मोड़ा के
शहरफाटक पर एक विशाल सभा हुई। यह स्थान सालम क्षेत्र का प्रवेश द्वार था। कांग्रेस
के वरिष्ठ नेता हरगोविंद पंत ने यहां तिरंगा झंडा फहराया; पर राजस्व पुलिस ने बलपूर्वक झंडा उतरवा कर जनसमूह को तितर बितर कर दिया। इससे
जनता में नयी ऊर्जा भर गयी। निर्णय हुआ कि लोकमान्य तिलक की पुण्यतिथि (एक अगस्त)
पर सालम पट्टी में 11 स्थानों पर तिरंगा फहराया जाएगा। गांव-गांव
में इसकी तैयारी होने लगी।
नौ अगस्त को गांधी जी आदि
की गिरफ्तारी की खबर से अल्मोड़ा, नैनीताल, हल्द्वानी, देहरादून आदि नगरों में हड़ताल हुई। लोग सड़कों पर आकर
विरोध प्रदर्शन करने लगे। सालम क्षेत्र के नेताओं ने सरकार के विरोध में एक बड़े
प्रदर्शन की योजना बनायी। यह जानकारी मिलने पर पुलिस रात में उनके घरों में छापे
मारने लगी। इस पर नेता लोग भूमिगत हो गये।
11 अगस्त को पटवारी पुलिस दल ने सांगण गांव में आंदोलन के
नेता रामसिंह आजाद के घर छापा मारा। उन दिनों पहाड़ में पटवारी को ही पुलिस के
अधिकार मिले हुए थे। उनके घर पर ‘कौमी सेवा दल’ के अनेक स्वयंसेवक मौजूद थे। रामसिंह शौच के बहाने बाहर निकल गये और फिर पुलिस
के हाथ नहीं आये। उस समय सालम क्षेत्र में 200 से अधिक युवा
कार्यकर्ता जन जागरण में लगे थे।
19 अगस्त को नौगांव में हो रही एक बैठक में पुलिस ने छापा
मारकर 14 युवाओं को पकड़ लिया। इन्हें अल्मोड़ा ले जाते समय ‘भारत माता की जय’ के नारे गंूजने लगे। गांव वालों ने पुलिस को
जबरन रोकना चाहा। इस धक्कामुक्की में पटवारी ने हवा में गोली चला दी। इससे जनता
लाठी डंडे लेकर पुलिस पर टूट पड़ी। पुलिस भाग गयी और सत्याग्रही छुड़ा लिये गये।
कुछ दिन बाद लोगों ने
जैंती स्कूल में रखी शासकीय सामग्री नष्ट कर दी। इससे कुमाऊं के कमिश्नर ऐक्टन ने
सेना की एक टुकड़ी भेज दी। उधर आंदोलनकारियों ने 25 अगस्त, 1942 को धामदेव के
मैदान में एकत्र होने की घोषणा कर दी। सुबह से ही लोग तिरंगा झंडे के साथ ढोल, नगाड़े और रणसिंघे लेकर पहुंचने लगे। दोपहर में सैन्य टुकड़ी भी आ गयी।
अंग्रेज कप्तान ने चेतावनी देते हुए हवा में गोली चलाई। वह सोच रहा था कि इससे लोग
डर जाएंगे; पर हुआ उल्टा। लोग भड़क गये और सेना पर पत्थर बरसाने लगे।
इधर पुलिस ने लाठीचार्ज
शुरू कर दिया। इससे सैकड़ों लोग घायल हो गये। दो युवा (21 वर्षीय) नरसिंह धानक और टीकासिंह एक टीले पर चढ़कर पथराव करने लगे। इस पर सैनिकों
ने गोली चला दी। नरसिंह का वहीं और टीकासिंह का अगले दिन अस्पताल में प्राणांत
हुआ। सैकड़ों लोग गिरफ्तार कर लिये गये। पुलिस ने उन्हें बंदूकों की बटों से पीटा।
वे सत्याग्रही महीनों जेल में रहे; पर उनका मनोबल कम नहीं
हुआ। 200 लोग बुरी तरह घायल हुए।
यह घटना स्वाधीनता आंदोलन
के इतिहास में ‘सालम क्रांति’ के नाम से प्रसिद्ध है।
इससे पूरे उत्तराखंड में जागृति की लहर दौड़ गयी। गांधी जी इसे ‘कुमाऊं की बारदोली’ कहा। हर 25 अगस्त को हजारों
लोग वहां पहुंचकर उन दो युवा शहीदों की स्मृति को प्रणाम करते हैं।
(हि.हुंकार, मई 2025/22, जयप्रकाश पांडेय)
27 अगस्त/जन्म-दिवस
श्री विश्वनाथ सिद्धेश्वर
लिमये में जहां एक ओर संगठन और समाजसेवा का भाव था, तो दूसरी ओर
आध्यात्मिक प्रवृत्ति भी भरपूर थी। इसी के चलते 30 वर्ष तक प्रचारक
रहने के बाद उन्होंने संन्यास ले लिया। उनका जन्म 27 अगस्त, 1919 को गोंदिया (महाराष्ट्र) में एक किसान परिवार में हुआ था। गोंदिया से
प्राथमिक शिक्षा पाकर नागपुर, प्रयागराज तथा फिर 1940 में उन्होंने काशी हिन्दू वि.वि. से औद्योगिक रसायन शास्त्र तथा तंत्र
विज्ञान में बी.एस-सी. की।
इसी दौरान उनका संपर्क
संघ से हुआ। डा. हेडगेवार के देहांत के बाद सरसंघचालक श्री गुरुजी ने युवा
स्वयंसेवकों से समय देने का आह्वान किया। इसे स्वीकार कर सैकड़ों युवक आगे आये।
इनमें विश्वनाथ जी भी थे। उन्हें 1941 में राजस्थान भेजा गया।
उस समय राजस्थान छोटे-छोटे रजवाड़ों में बंटा था। देश की बजाय जाति तथा क्षेत्र का
दुरभिमान अधिक था। अंग्रेज शासन भी षड्यंत्रपूर्वक इस विभेद को बढ़ाता रहता था।
विश्वनाथ जी सबसे पहले
अजमेर आये। वे रात में वहां पहुंचे। ठंड के दिन थे। एक हलवाई की बंद दुकान की
भट्टी के पास बैठकर रात काटी। उनके पास श्री गुरुजी का एक पत्र था। अगले दिन उसे
लेकर वे श्री चांदकरण शारदा के पास गये। उन्होंने अपनी हवेली में रहने की जगह दे
दी। विश्वनाथ जी कई दिन तक घूमते रहे; पर सफलता नहीं मिली। फिर
चांदकरण जी के सुझाव पर वे ऋषि उद्यान में चलने वाले आर्यवीर दल के अखाड़े में
जाने लगे। वहां उनके कुछ मित्र बने। फिर उन्हीं से संघ की पहली शाखा शुरू हुई।
अजमेर में रेलवे के
कारखाने में मराठीभाषी कर्मचारी बड़ी संख्या में काम करते थे। विश्वनाथ जी अब उनसे
संपर्क किया। इस प्रकार दूसरी शाखा लगने लगी। फिर नसीराबाद, किशनगढ़, ब्यावर, डीडवाना, जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा आदि में शाखाएं शुरू हुईं। वे पैदल या साइकिल से प्रवास करते थे। इस
प्रकार 1946 तक राजस्थान के सभी नगरों में संघ पहुंच गया। पूरे राज्य
में मुस्लिम लीग आदि के आतंक पर इससे रोक लगी।
1948 में संघ पर लगा प्रतिबंध 1950 में हट गया। अब
विश्वनाथ जी को राजस्थान से उ.प्र. भेजा गया। वे 1968 तक उ.प्र. में
ही रहे। उनमें संगठन के साथ अध्यात्म भाव भी प्रबल था। इसके चलते 1970 में उन्होंने संन्यास ले लिया। कई वर्ष वे कन्याकुमारी रहे। फिर कांची
कामकोटि के शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती के साथ उ.प्र., बिहार, नेपाल तथा तमिलनाडु आदि में पदयात्राएं कीं। रामेश्वरम् तथा
ऋषिकेश के शिवानंद आश्रम में रहकर गायत्री पुरश्चरण किया। वे अत्यधिक परिश्रमी तथा
अध्ययनशील स्वभाव के थे।
विश्वनाथ जी अच्छे वक्ता, चिंतक और लेखक थे। उन्होंने दीनदयाल जी के चिंतन को आगे बढ़ाते हुए ‘मैं या हम’ पुस्तक लिखी। दूसरी पुस्तक ‘वाल्मीकि के
ऐतिहासिक राम’ कई भाषाओं में प्रकाशित हुई। इसकी प्रस्तावना पूज्य
प्रभुदत्त ब्रह्मचारी तथा श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी ने लिखी। बच्चों के लिए लिखित चित्रकथा
‘महामानव राम’ का लोकार्पण ऋषिकेश के
पुष्कर मंदिर में हुआ।
संन्यासी होने के नाते विश्वनाथ जी लगातार घूमते रहते थे। संघ संस्थापक डा. हेडगेवार की जन्मशती पर उन्होंने विदर्भ के सतपुड़ा क्षेत्र में 15 दिन तक पदयात्रा की। 100 कि.मी की इस यात्रा से वहां वनवासी गांवों में धर्मांतरण की गतिविधियों पर रोक लगी। वे वनवासियों की बीच गांव में ही रुकते थे तथा वहां कथा आदि के बाद प्रसाद ग्रहण करते थे। उनकी इच्छा कन्याकुमारी के समुद्र तट पर ‘‘बोले राम सकोप तब, भय बिनु होई न प्रीति’’ को दर्शाती हुई श्रीराम की एक विशाल प्रतिमा बनाने की थी; पर एक फरवरी, 1993 को कोयम्बूटर में उनके देहांत से यह योजना पूरी नहीं हो सकी।
(और यह जीवन समर्पित/12, ज्ञानगंगा प्रका. जयपुर)27 अगस्त/इतिहास-स्मृति
भैरनपल्ली में
भीषण हिन्दू नरसंहार
15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र तो हो गया; पर वह कई रियासतों में बंटा था। हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष सब रियासतें भारत में मिल गयीं। गृहमंत्री सरदार पटेल ने साम दाम दंड भेद की नीति अपनाकर हैदराबाद और जूनागढ़ को भारत में मिला लिया। जम्मू कश्मीर का विषय प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने पास रखा। अतः वह समस्याग्रस्त ही रह गया।
हैदराबाद का शासक निजाम मीर उस्मान अली हिन्दुओं से घृणा करता था। वहां 13 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या थी; पर उच्च पदों पर 88 प्रतिशत मुसलमान थे। राज्य की आय का 97 प्रतिशत हिन्दुओं से आता था; पर शासन में उनका दखल न के बराबर था। निजाम चाहता था कि या तो वह स्वतंत्र रहे, या फिर मुस्लिम देश पाकिस्तान में मिल जाए। कासिम रिजवी के नेतृत्व में ‘मजलिस एतिहाद उल मुसलमीन’ नामक संस्था इसके लिए काम कर रही थी। इसका ‘रजाकार’ नामक सशस्त्र समूह था। वे हिन्दुओं पर खूब अत्याचार करते थे। कई मुसलमान तो लूटपाट के लालच में अन्य राज्यों से आकर इसमें भरती हो गये थे। वे हैदराबाद को पूरी तरह मुस्लिम राज्य बनाना चाहते थे।
रजाकार हैदराबाद की किसी भी बस्ती या निकटवर्ती गांव में जाकर लूटपाट और हत्या करने लगते थे। वे हिन्दुओं से ‘जजिया’ भी वसूल करते थे। हत्या से पहले वे कई लोगों का प्रमाण के रूप में अपने साथ फोटो खींचते थे। हिन्दू युवतियों का अपहरण और बलात्कार आम बात थी। हिन्दुओं की कहीं कोई सुनवाई नहीं थी। 22 मई, 1948 को गंगापुर रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ी रोककर उसमें सवार हिन्दुओं पर हमला किया गया। इससे पूरे देश में निजाम के प्रति विरोध की भावनाएं भड़क उठीं; पर नेहरू जी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
आर्य समाज और हिन्दू महासभा ने हैदराबाद के भारत में विलय के लिए आंदोलन चलाया। डा. बर्गुला रामाकृष्ण राव इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे। पूरे देश से सत्याग्रही वहां आते थे। उन पर भी खूब अत्याचार किये गये। कई सत्याग्रही तो निजाम की जेल में ही मार दिये गये। आजादी मिले एक साल हो गया; पर निजाम के रुख में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
हैदराबाद के पास भैरनहल्ली नामक एक गांव था। रजाकार तीन बार यहां हमला कर चुके थे; पर ग्रामीण लोग रात भर जागकर पहरा देते थे। भेड़ बकरी चराने वाले चरवाहे उनके आने की सूचना गांव में पहुंचा देते थे। इससे गांव वाले कुल्हाड़ी, फरसे, तलवार, भाले, पत्थर, गुलेल आदि लेकर तैयार रहते थे। इससे रजाकारों को मुंह की खानी पड़ती थी। वे मौके की तलाश में थे।
27 अगस्त, 1948 को स्थानीय जनजातीय समाज का वार्षिक पर्व ‘बैठकुमा’ मनाया जा रहा था। लोग पूजा आदि में व्यस्त थे। इसका लाभ उठाकर रजाकारों तथा हैदराबाद स्टेट पुलिस ने वहां हमला कर दिया। उनके पास बंदूकें तथा छोटी तोपें भी थीं। ग्रामीण चौकीदारों को गोली मारकर घरों में आग लगा दी गयी। निहत्थे ग्रामीणों को एक जगह एकत्र कर लिया गया। फिर गोलियां बचाने के लिए एक साथ तीन लोगों को आगे पीछे खड़ाकर गोली मारी गयी। महिलाओं को निर्वस्त्र कर लाशों के सम्मुख नचाया गया। उनके गहने छीन लिये गये। कई महिलाओं ने कुएं में कूदकर अपनी लाज बचाई।
इस नरसंहार में लगभग 120 हिन्दू मारे गये। सैकड़ों लोग जीवन भर के लिए अपाहिज हो गये। सरदार पटेल को जब यह पता लगा, तो उन्होंने सितम्बर 1948 में ‘आॅपरेशन पोलो’ के अन्तर्गत पुलिस कार्यवाही की। भयभीत निजाम ने समर्पण कर दिया। कासिम रिजवी और निजाम का प्रधानमंत्री मीर लायक अली पाकिस्तान भाग गये। इस प्रकार सरदार पटेल के प्रयास से हैदराबाद रियासत भारत का अंग बनी तथा हिन्दुओं को अत्याचारों से मुक्ति मिली।
(विकी/पांचजन्य 13.11.1022,
डा. नियति चौधरी)
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गीतकार स्वाधीनता सेनानी
झवेरचंद मेघाणी
स्वाधीनता संग्राम में एक
ओर गांधी जी के अहिंसावादी अनुयायी थे, तो दूसरी ओर बम
और गोली के पुजारी। सबके समन्वित प्रयास से आजादी प्राप्त हुई। गांधीवादी झवेरचंद
मेघाणी ने अपने गीतों से आजादी की अलख जगाई। उनका जन्म 28 अगस्त,
1896 को गुजरात के चोटिला गांव में श्री कालीदास
तथा धोलीबाई मेघाणी के घर में हुआ था।
गांधी जी की दांडी यात्रा
12 मार्च 1930 को साबरमती से शुरू होकर
छह अपै्रल, 1930 को पूर्ण हुई। वहां उन्होंने एक चुटकी नमक बनाकर पूरे देश
को आंदोलित कर दिया। इसी दिन मेघाणी जी की 15 क्रांति गीतों
वाली पुस्तक ‘सिंधुडो’ प्रकाशित हुई। शासन ने
इसे जब्त कर लिया;
पर लोगों ने इसकी सैकड़ों प्रतियां हाथ से बना
लीं। जिसके पास ये पुस्तक मिलती, उसे भी बंद कर दिया जाता
था। धोलेरा तथा बरवाला गांव के ऐसे कुछ बंदियों से मिलने झवेरभाई धंधुका थाने में
गये, तो उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। इस पर पूरे क्षेत्र में
जुलूस, हड़ताल और विरोध सभाएं हुईं। राणपुर में नदी के किनारे हुई
सभा में तो कई हजार लोग शामिल हुए।
28 अपै्रल, 1930 को मुकदमा शुरू
हुआ। उन पर आरोप था कि बरवाला की सभा में उन्होंने उत्तेजनापूर्ण भाषण दिया।
झवेरभाई ने अपने लिखित वक्तव्य में शासन की पोल खोल दी। फिर उन्होंने एक
प्रार्थना गीत गाने की अनुमति मांगी। गीत सुनकर न्यायाधीश की आंखें भी भीग गयीं।
अगले दिन उन्हें दो साल की सजा सुनाई गयी। न्यायाधीश ने कहा कि झवेरचंद मेघाणी
सुशिक्षित व्यक्ति हैं; पर काठियावाड़ क्षेत्र में शासन के विरुद्ध
वातावरण बनाने में उनकी बड़ी भूमिका है। साहित्य तथा पत्रकारिता में उनके योगदान
को देखते हुए मैं जेल में उन्हें ‘अ’ श्रेणी देने की अनुशंसा करता हूं।
सारे न्यायालय में ‘भारत माता की जय’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे गूंजने लगे। उनकी मां और पत्नी ने तिलक कर उन्हें जेल के लिए विदा
किया। यह अदालत धंधुका के डाक बंगले में जिस नीम के पेड़ के नीचे आयोजित हुई थी, वहां बना चबूतरा ‘मेघाणी ओटला’ कहलाता है।
झवेरभाई का गुजरात एवं
सिंध के लोक साहित्य में बड़ा स्थान है। उनकी लगभग 100 पुस्तकें
प्रकाशित हुई हैं। इसके लिए उन्हें रणजीतराम स्वर्ण पदक प्रदान किया गया।
रवीन्द्रनाथ टैगोर के प्रति उनके मन में बहुत आदर था। टैगोर का ‘नववर्षा’ काव्य झवेरभाई ने उनके मुंह से ही सुना था। 1944 में उन्होंने इसका अनुवाद किया। यह गीत ‘मन मोर बनी थनगाट
करे’ आज भी गरबा कार्यक्रमों में गाया जाता है। इसे फिल्मों में
भी लिया गया है।
गांधी जी के गोलमेज
सम्मेलन में जाने पर झवेरभाई ने ‘झेरनो कटोरो’ काव्य लिखा। इससे प्रभावित होकर गांधी जी ने उन्हें ‘राष्ट्रीय शायर’ कहा। वे चार साल तक गुजराती साहित्य परिषद में
साहित्य प्रमुख भी रहे। 1922 से 35 तक वे ‘सौराष्ट्र’ अखबार तथा 1936 से 45 तक ‘फूलछाब’ अखबार के संपादक रहे। उनके गुजरात नो जय, रोढियाली रात तथा
सौराष्ट्रनी रसधार काव्य बहुत प्रसिद्ध हैं। उन्होंने बंगला साहित्य का अनुवाद भी
किया। उनके सैकड़ों लेख, नाटक, कहानी, निबंध तथा उपन्यास आदि प्रकाशित हुए हैं।
झवेरभाई ने अंग्रेजी तथा
संस्कृत में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की थी। 26 वर्ष में उनका
विवाह दमयंती बेन से हुआ। उन्होंने तीन साल इंग्लैंड में भी नौकरी की; पर देशप्रेम उन्हें वापस खींच लाया। कुछ समय उन्होंने कोलकाता में भी नौकरी
की। वहीं उनका बंगला साहित्य से संपर्क हुआ। 50 वर्ष की आयु में
नौ मार्च, 1947 को सौराष्ट्र के बोटाद में हृदयाघात से उनका देहांत हुआ। 1999 में उन पर तीन रु. का डाक टिकट जारी किया गया है।
(विकी, न्यू इंडिया समाचार 16.8.22, दै.जा.13.12.21/राजेन्द्र निगम)
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सादगी और गोसेवा के प्रतिरूप
श्रीधर हनुमंत आचार्य
विश्व हिन्दू परिषद में कार्यरत वरिष्ठ प्रचारक श्रीधर हनुमंत आचार्य का जन्म रक्षाबंधन 28 अगस्त, 1928 को उडुपी (कर्नाटक) में हुआ था। 1946 में उनकी संघ यात्रा प्रारम्भ हुई, जो जीवन की अंतिम सांस तक चलती रही।
प्रभात और सायं शाखा के मुख्यशिक्षक रहने के बाद वे अलीबाग, चोपड़ा, धनुपाली गांव आदि में विस्तारक रहे। विज्ञान और कानून में स्नातक श्रीधर जी ने श्री दामोदाते की प्रेरणा से 1950 में अपना जीवन संघ कार्य हेतु समर्पित कर दिया। उस समय वे दस कार्यकर्ताओं के साथ नागपुर आये थे।
उन्हें सर्वप्रथम उड़ीसा में बालांगीर जिले का काम मिला। बाबूराव पालधीकर वहां प्रांत प्रचारक थे। उन दिनों संघ के पास साधन के नाम पर कुछ नहीं था। किसी तरह उन्होंने 12 रु. महीने पर एक कमरा लिया। उड़ीसा में महाराष्ट्र के लोगों को वर्गी (लुटेरा) माना जाता था। पुलिस का व्यवहार भी ठीक नहीं था। थाने में हर दिन हाजिरी देनी पड़ती थी। एक दिन कमरे का ताला तोड़कर सब सामान चुरा लिया गया। फिर भी वे लोगों से सम्पर्क करते रहे।
1951 में उनके प्रयास सफल हुए और एक मंदिर में शाखा लगने लगी। लाठी सिखाने के कारण लोग उन्हें ‘बॉडी मास्टर’ कहते थे। क्रमशः उन पर जिला और विभाग प्रचारक के नाते कालाहांडी और कोरापुट का काम भी रहा। साधनों के अभाव में अधिकांश प्रवास पैदल या साइकिल से ही होता था। उन्होंने क्रमशः 1949, 50 तथा 55 में तीनों वर्ष के संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण लिया।
1965 में वे उड़ीसा में जनसंघ के प्रांत संगठन मंत्री बने। आपातकाल में वे ‘मीसा’ बन्दी के नाते कटक जेल में रहे। वे 1977 में संबलपुर विभाग प्रचारक तथा 1980 में ‘संस्कृति रक्षा योजना’ के प्रांत संयोजक बने। संस्कृत के प्रति रुचि देखकर 1984 में उन्हें ‘संस्कृत प्रशिक्षण वर्ग’ लगाने का तथा फिर 1986 में वाराणसी में ‘विश्व संस्कृत प्रतिष्ठानम्’ का कार्य मिला। 1990 में उन्हें लखनऊ में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा संचालित सत्संगों की देखभाल के लिए भेजा गया। 1993 में वे वि.हि.प. के मुख्यालय (संकटमोचन आश्रम) में आ गये तथा प्रकाशन संबंधी न्यास के मंत्री बनाये गये।
दिल्ली रहते हुए श्रीधर जी नागपुर गोशाला में निर्मित दवाएं मंगाकर बेचते थे। इसी दौरान वे ग्राहक को संघ विचार भी ठीक से समझा देते थे। आश्रम की गोशाला से एकत्र गोमूत्र तथा कंडे वे निःशुल्क बांटते थे। वे पत्र, पत्रिका तथा निमंत्रण पत्र आदि की रद्दी को बेचकर वह राशि गोसेवा में लगा देते थे। वे सड़क पर घूमते समय कांच और प्लास्टिक की बोतलें भी उठा लाते थे। लोग उन्हें ‘रद्दी का राजा’ कहकर हंसते थे; पर उन्होंने कभी इसकी चिन्ता नहीं की। आश्रम के निकटवर्ती साप्ताहिक बाजार में वे पत्रक आदि बांटते रहते थे। आश्रम में तैनात सरकारी सुरक्षाकर्मी भी उनका बहुत आदर करते थे।
श्रीधर जी का अध्ययन बहुत गहरा था। वे हिन्दी, मराठी, कन्नड़, अंग्रेजी, संस्कृत, बंगला, ओडिया आदि कई भाषाएं जानते थे। आश्रम में कई राज्यों से पत्र-पत्रिकाएं आती हैं। उनमें से काम की चीज निकालकर वे संबंधित कार्यकर्ता को दे देते थे।
उनका जीवन बहुत सादा था। वे प्रायः साबुन, तेल आदि भी प्रयोग नहीं करते थे। अपने बाल भी वे खुद ही काट लेते थे। गर्मी में वे आधी धोती पहनते और आधी ओढ़ लेते थे। ऐसे में किसी भी अव्यवस्था तथा फिजूलखर्ची से वे विचलित हो जाते थे। कुछ वर्ष से वे मधुमेह तथा उच्च रक्तचाप आदि से पीड़ित थे। कभी-कभी तो वे मस्तिष्क से नियंत्रण ही खो बैठते थे।
28 फरवरी, 2015 को संकटमोचन आश्रम में ही उनका निधन हुआ। एक सप्ताह पूर्व से उन्होंने अन्न-जल लेना छोड़ दिया था। उन्होंने कई वर्ष पूर्व ‘दधीचि देहदान समिति’ का संकल्प पत्र भरा था। अतः निधन के बाद उनके नेत्र और फिर पूरी देह 'अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान' को दे दी गयी।
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29 अगस्त/जन्म-दिवस
30 अगस्त/जन्म-दिवस
परिश्रम के अवतार ओमप्रकाशजी
उ.प्र. में संघ विचार के हर काम को मजबूत करने वाले श्री ओमप्रकाशजी का जन्म 30 अगस्त, 1927 को पलवल (हरियाणा) में श्री कन्हैयालालजी तथा श्रीमती गेंदी देवी के घर में हुआ था। उनकी पढ़ाई मुख्यतः मथुरा में हुई। जिला प्रचारक श्री कृष्णचंद्र गांधी के संपर्क में आकर 1944 में वे स्वयंसेवक बने।
1945, 46 और 47 में तीनों वर्ष के संघ शिक्षा वर्ग तथा पढ़ाई पूर्ण कर 1947 में अलीगढ़ के अतरौली से उनका प्रचारक जीवन प्रारम्भ हुआ। क्रमशः वे मथुरा नगर (1952), मथुरा जिला (1953-57), बिजनौर जिला (1957-67), बरेली जिला (1967-69) और फिर बरेली विभाग प्रचारक रहे। उन दिनों उत्तराखंड का कुमाऊं क्षेत्र बरेली विभाग में ही था। 1948 के प्रतिबंध काल में वे अलीगढ़ जेल में रहे। बिजनौर में पूरे जिले का प्रवास वे साइकिल से ही करते थे। उन्होंने साइकिल के हैंडल पर रखकर किताब पढ़ने का अभ्यास भी कर लिया था। चाय और प्याज-लहसुन का उन्होंने कभी सेवन नहीं किया। वे होम्योपैथी तथा आयुर्वेदिक दवाएं ही प्रयोग करते थे।
आपातकाल के दौरान वे बरेली और मुरादाबाद के विभाग प्रचारक थे। वहीं रामपुर जिले के शाहबाद में पुलिस ने उन्हें तत्कालीन प्रांत प्रचारक माधवराव देवड़े के साथ गिरफ्तार कर लिया। फिर पूरे आपातकाल वे मीसा के अंतर्गत रामपुर जेल में ही रहे। आपातकाल के बाद 1978 में वे पश्चिमी उ.प्र. के प्रांत प्रचारक बनाये गये। 1989 में वे सहक्षेत्र प्रचारक तथा 1994 में क्षेत्र प्रचारक बने। 2004 में उन्हें अखिल भारतीय सहसेवा प्रमुख और 2006 में केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य की जिम्मेदारी मिली।
ओमप्रकाशजी परिश्रम के अवतार थे। सुबह चार बजे के बाद और रात को 11 बजे से पहले वे कभी सोते नहीं थे। दोपहर में भी वे कभी विश्राम नहीं करते थे। वे कहते थे कि प्रचारक की सबसे बड़ी विशेषता उसकी हर समय उपलब्धता है। अपने भारी थैले के साथ वे सदा प्रवास में रहते थे। लोग हंसी में कहते थे, ‘‘रात में यात्रा दिन में काम, ओमप्रकाशजी को नहीं आराम।’’ बिना डायरी के ही सैकड़ों फोन नंबर उन्हें याद रहते थे। प्रचारक हो या गृहस्थ कार्यकर्ता, वे सबकी पूरी चिंता करते थे। उनके साथ रहे कई प्रचारक आज संघ तथा समविचारी संगठनों में राष्ट्रीय स्तर पर काम कर रहे हैं।
गोवंश के प्रति उनकी भक्ति अनुपम थी। दिल्ली में उन्हें ‘गोऋषि’ की उपाधि दी गयी थी। वे कहते थे कि दूध के अलावा बाकी चीजें भी जब आर्थिक रूप से लाभकारी होंगी, तभी लोग बूढ़ी गायों को घर पर रखेंगे। उन्होंने गोबर और गोमूत्र से मनुष्य, पशु और खेती के उपयोगी कई उत्पाद बनवाये तथा इनके उद्योग भी लगवाये। दिल्ली में आई.आई.टी के वैज्ञानिकों को भी इसमें लगाया। छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से भी इस दिशा में कई सफल प्रयोग किये।
चुनावों में वे फोन पर 24 घंटे उपलब्ध रहकर राज्य की हर विधानसभा और लोकसभा सीट की चिंता करते थे। इसी से आज उ.प्र. भारतीय जनता पार्टी का गढ़ बन सका है। राममंदिर आंदोलन में सभी योजनाओं की पृष्ठभूमि में रहकर हर तनाव और दबाव को उन्होेंने झेला। लखनऊ में विश्व संवाद केन्द्र और माधव सेवाश्रम तथा मथुरा में दीनदयालजी के पैतृक गांव नगला चंद्रभान में हुए निर्माण में उनकी भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी।
भावुक प्रवृत्ति के ओमप्रकाशजी निराशा और हताशा से सदा दूर रहे। उन्होंने उ.प्र. में पूर्व सैनिक सेवा परिषद, अधिवक्ता परिषद, शैक्षिक महासंघ, विश्व आयुर्वेद परिषद, आरोग्य भारती, प्रकृति भारती आदि कई संगठन बनाये, जो अब अखिल भारतीय बन चुके हैं। 2003 में लखनऊ कार्यालय में सीढि़यों से गिरकर उनके सिर में गंभीर चोट आ गयी; पर ठीक होकर वे फिर काम में लग गये। फेफड़े एवं हृदय में संक्रमण के कारण चार अगस्त, 2019 को लखनऊ में ही उनका निधन हुआ। उनकी इच्छानुसार उनकी देह छात्रों के अनुसंधान के लिए लखनऊ के मैडिकल काॅलिज को दे दी गयी।
(संदर्भ : व्यक्तिगत वार्ता एवं वि.सं.केन्द्र, लखनऊ)
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पिलखुवा में हुए गोरक्षा सम्मेलन में संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी व लाला हरदेव सहाय के सामने उसने मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘दांतों तले तृण दाबकर...’ पढ़कर प्रशंसा पायी। 1953 में भारतीय जनसंघ ने जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए आंदोलन किया, तो कौशल्या देवी महिला दल के साथ सत्याग्रह कर जेल गयीं। रामानुज जनसंघ का झंडा लेकर नगर में निकले जुलूस के आगे-आगे चला।
31 अगस्त/जन्म-दिवस
वात्सल्य की प्रतिमूर्ति उषाताई चाटी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से नारी वर्ग में राष्ट्र सेविका समिति नामक संगठन चलता है। इसकी तीसरी प्रमुख संचालिका वंदनीया उषाताई चाटी का जन्म भंडारा (महाराष्ट्र) के फणसे परिवार में 31 अगस्त, 1927 (गणेश चतुर्थी) को हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा भंडारा के मनरो हाई स्कूल में हुई। वहां श्रीमती नानी कोलते समिति की शाखा लगाती थीं। उसी में उषाजी ने जाना प्रारम्भ किया। मधुर कंठ की धनी उषाजी धीरे-धीरे समिति से एकाकार हो गयीं। इसी दौरान उन्होंने बी.ए और बी.टी. की डिग्री भी प्राप्त की।
1948 में उनका विवाह नागपुर में एक स्वयंसेवक श्री गुणवंत चाटी (बाबा) से हुआ। उषाजी ने भंडारा की जकातदार कन्याशाला में और विवाह के बाद नागपुर की हिन्दू मुलींची शाला में पढ़ाया। भूगोल और मराठी उनके प्रिय विषय थे। छात्राओं के विकास एवं उन्हें अच्छा वक्ता बनाने के लिए उन्होंने ‘वाग्मिता विकास समिति’ बनायी, जिसकी 30 साल तक वे अध्यक्ष रहीं। श्री गुणवंत चाटी 1948 में संघ के प्रतिबंध काल में सत्याग्रह कर जेल गये थे। उषाजी कुछ समय पूर्व ही घर में सबसे बड़ी बहू बनकर आयी थीं। उस कठिन परिस्थिति में धैर्यपूर्वक उन्होंने पूरे परिवार को संभाला।
सामाजिक कामों में रुचि होने के चलते परिवार और अध्यापन में संतुलन बनाते हुए वे क्रमशः समिति में सक्रिय होने लगीं। पहले उन्हें नागपुर नगर कार्यवाह और फिर विदर्भ प्रांत कार्यवाह का काम दिया गया। इससे उनका प्रवास का क्रम प्रारम्भ हो गया। अब वे सबके लिए उषाताई हो गयीं। उनका कंठ बहुत मधुर था। वे आकाशवाणी नागपुर से कार्यक्रम भी देती थीं। 1970 में समिति में उन्हें अखिल भारतीय गीत प्रमुख की जिम्मेदारी दी गयी। 1975 में देश में आपातकाल लगने पर उषाताई ने सत्याग्रह कर इसका विरोध किया। अतः उन्हें जेल में भी रहना पड़ा। उन्होंने अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार से वहां बंदी महिलाओं को धैर्य बंधाया और कष्ट सहने की मानसिकता निर्माण की।
आपातकाल के बाद 1977 में उन्हें उ.प्र. जैसे बड़े राज्य में संगठन विस्तार पर ध्यान देने को कहा गया। सब कामों में सामंजस्य बैठाते हुए उन्होंने कई बार उ.प्र. का सघन प्रवास किया। 1982 में पति के निधन के बाद उन्होंने पूरा समय समिति के काम में ही लगा दिया। वे घर की बजाय अब समिति के कार्यालय (अहल्या मंदिर) में ही रहने लगीं। वहां वनवासी बालिकाओं का एक छात्रावास भी चलता है। उन दिनों ताई आप्टे राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख संचालिका थीं। उन्होंने उषाताई को समिति में सह प्रमुख संचालिका की जिम्मेदारी दी। 1991 से वे विश्व हिन्दू परिषद की केन्द्रीय बैठकों में भी जाती थीं। 1994 में ताई आप्टे के निधन के बाद वे समिति की प्रमुख संचालिका बनीं।
2005 में नागपुर के पास खापरी में उनके नेतृत्व में दस हजार सेविकाओं का एक भव्य कार्यक्रम हुआ। प्रवास के दौरान समस्याग्रस्त क्षेत्रों में कई बार पुलिस की गाड़ी या सेना के ट्रक पर भी उन्हें यात्रा करनी पड़ी; पर उन्होंने कभी इसकी चिंता नहीं की। वृद्धावस्था में उन्हें कई रोगों ने घेर लिया। इनमें घुटने का दर्द विशेष था। फिर भी उन्होंने अपना प्रवास कभी स्थगित नहीं किया। अपनी सहयोगी एवं युवा कार्यकर्ताओं पर उन्हें बहुत विश्वास था। वे खुलकर उनकी प्रशंसा करती थीं तथा बहुत सहजता से उन्हें काम सौंप देती थीं। वे सब भी पूरी ताकत लगाकर उसे पूरा करती थीं। सेविकाओं के आग्रह पर वृद्धावस्था में भी वे गीत गाने में संकोच नहीं करती थीं।
उषाताई को देश की अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया। कई पुरस्कारों के साथ कुछ धनराशि भी मिलती थी। वह सारी राशि वे ‘संघमित्रा सेवा संस्थान’ को दे देती थीं। 17 अगस्त, 2017 को त्याग, प्रेम और समर्पण की प्रतिमूर्ति वंदनीय उषाताई चाटी का निधन समिति के नागपुर कार्यालय में ही हुआ।
(शाश्वत राष्ट्रबोध एवं हिन्दी विवेक सितम्बर 2017)
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31 अगस्त/पुण्य-तिथि
कृषि वैज्ञानिक
प्रो. बोसी सेन
भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में जिन कृषि वैज्ञानिकों का बड़ा योगदान है, उनमें प्रोफेसर बसेश्वर (बोसी) सेन का नाम विशेष है। उनका जन्म 1887 में बंगाल के बांकुरा जिले के विष्णुपुर में हुआ था। उनके पिता श्री रामेश्वर सेन एक सरकारी कर्मचारी थे तथा माता प्रसन्नमयी देवी घरेलू एवं धार्मिक महिला थीं। बोसी की प्रारंभिक शिक्षा विष्णुपुर में ही हुई।
जब वे आठ साल के थे, तो उनके पिताजी का देहांत हो गया। इससे घर में आर्थिक संकट छा गया। बोसी पढ़ने के लिए अपनी दीदी के पास रांची चले गये। कोलकाता के सेंट जेवियर काॅलेज से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। बेलूर मठ में स्वामी विवेकानंद के शिष्य स्वामी सदानंद से हुई भेंट ने उनके जीवन में अध्यात्म और सेवा का बीजारोपण किया।
एक बार उनकी इच्छा संन्यास लेने की हुई; पर रामकृष्ण मिशन के स्वामी ब्रह्मानंद ने उन्हें विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने को कहा। भगिनी निवेदिता की सलाह पर वे वैज्ञानिक श्री जगदीश चंद्र बोस के सहायक बन गये। उनकी विदेश यात्रा में वे साथ जाते थे। वहां उनकी कई वैज्ञानिकों से भेंट हुई। उन्होंने चार जुलाई, 1924 को कोलकाता में किराये के घर में ‘विवेकानंद प्रयोगशाला’ खोली। वे भौतिक विज्ञान में ही आगे काम करना चाहते थे।
लेकिन 1943 में बंगाल में भीषण अकाल पड़ा। लोग दाने-दाने का तरस गये। इससे बोसी सेन ने ऐसी संकर फसलें उगाने की दिशा में काम शुरू किया, जो जल्दी और अधिक मात्रा में उग सकें। क्रमशः और भी कई वैज्ञानिक इस काम में लगे। इसे ही ‘हरित क्रांति’ कहा गया। वे शांत वातावरण में काम करना चाहते थे। अतः 1926 में वे अपनी प्रयोगशाला अल्मोड़ा ले गये। वहां भी यह दो कमरे वाले किराये के घर (कुंदन हाउस) में शुरू हुई। वहां सुविधाएं तो नहीं थीं; पर खेती की जगह बहुत थी। वहीं वे अपने प्रयोग करने लगे।
उन्होंने मक्का और प्याज की संकर फसलें उगाने में सफलता प्राप्त की। मक्का का यह बीज पहाड़ में बहुत सफल रहा। उनके निष्कर्ष कई अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रों में प्रकाशित हुए। उनके प्रदर्शन तथा आगे शोध के लिए वे कई बार विदेश गये तथा वहां प्रयोगशालाओं में काम किया। उन्हें उच्च वेतन तथा सुविधाओं सहित वहीं रहने के कई प्रस्ताव मिले; पर उन्होंने देश की सेवा को ही प्राथमिकता दी। 1959 में राज्य शासन ने उन्हें 235 एकड़ सरकारी भूमि दी, जिससे वे अपने प्रयोगों का विस्तार कर सकें। उ.प्र. के मुख्यमंत्री श्री संपूर्णानंद स्वयं अल्मोड़ा आये और बोसी सेन को 1,000 रु. प्रतिमास के मानदेय पर ‘विवेकानंद प्रयोगशाला’ का आजीवन निदेशक बना दिया।
बोसी सेन के देश-विदेश में कई महान लोगों से संबंध थे। 1932 में उन्होंने विवेकानंद और गांधी जी के विचारों से प्रभावित अमरीकी भूवैज्ञानिक एवं पत्रकार जरट्रूड एमर्सन से विवाह किया। फिर दोनों मिलकर अल्मोड़ा में कृषि अनुसंधान में लग गये। उन्होंने मैक्सिको से बौने गेहूं के बीज मंगाकर उन्हें स्थानीय जलवायु के अनुकूल बनाया। इसके अलावा जौ, जई, शकरकंद, सेम, भिंडी, मटर, स्ट्राबेरी, एवोकेडो, कपास, रेमी, मशरूम आदि पर भी उन्होंने शोध किये। पशु चारे की भरपूर उपलब्धता के लिए उन्होंने नये बीज विकसित किये। किसानों के लिए उन्होंने प्रशिक्षण के कई कार्यक्रम भी शुरू किये।
बोसी सेन मानते थे कि प्रसिद्धि और अमीरी अनुसंधान में बाधक है। फिर भी विश्व की कई वैज्ञानिक संस्थाओं ने उन्हें अपना मानद सदस्य बनाया। भारत सरकार ने उन्हें 1957 में ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया। 31 अगस्त, 1971 को अपनी कर्मभूमि रानीखेत में उनका देहांत हुआ। विवेकानंद प्रयोगशाला अब भारत सरकार के अन्तर्गत ‘विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान’ के रूप में प्रोफेसर बोसी सेन के काम को आगे बढ़ा रही है।
(विकी/विज्ञान
मासिक, जनवरी 2009, देवेन्द्र मेवाड़ी)










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