महारानी तपस्विनी/सुनन्दा
रानी लक्ष्मीबाई के बारे में तो सब जानते हैं; पर उनकी सम्बन्धी सुनन्दा के बारे में इतिहास में अनेक भ्रम हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उनका जन्म दक्षिण भारत के अर्काट राजघराने में हुआ था। उनके पिता नारायणराव रायबेलूर के किलेदार थे। जबकि कुछ के अनुसार 1836 में उ.प्र. के बनारस में जन्मी सुनंदा लक्ष्मीबाई की भतीजी थी। उसके पिता का नाम पेशवा नारायणराव था।
1857 के स्वतन्त्रता
संग्राम में भाग लेने के कारण उन्हें त्रिचनापल्ली की जेल में रहना पड़ा। वहां से
छूटकर उन्होंने अध्यात्म,
योगाभ्यास और
संस्कृत अध्ययन को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। कुछ समय उ.प्र. के नैमिषारण्य तीर्थ
में रहकर उन्होंने विरक्त संत गौरीशंकर जी से दीक्षा ली। अब वे साधु-संतों के साथ
कथा-कीर्तन करते हुए घूमने लगीं। इस बहाने वे छावनियों में जाकर सैनिकों की
देशभक्ति जाग्रत करने तथा गुप्त सूचनाएं जुटाने लगीं।
पर इसका भेद खुलने पर वे नेपाल चली गयीं। उनकी विद्वत्ता
एवं तपस्वी जीवन से प्रभावित होकर लोग उन्हें ‘महारानी तपस्विनी या तपस्विनी माता’ कहने लगे। फिर वे
कोलकाता आ गयीं और वहां ‘महाकाली संस्कृत
पाठशाला’ की स्थापना की।
बंगाल में स्त्री शिक्षा का प्रारम्भ उन्होंने ही किया था। अतः बंगाल के शिक्षित घरानों
में इनकी बहुत प्रतिष्ठा थी। वहां लोग उन्हें ‘माताजी’ कहते थे। स्वामी विवेकानंद ने भी कई बार उनसे भेंट की थी।
1901 में कांग्रेस
अधिवेशन के समय जब लोकमान्य तिलक कोलकाता आये, तो वे इस पाठशाला में भी गये थे। सुनंदा ने ही उन्हें सुझाव
दिया कि वे भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए नेपाल से सम्पर्क बनायें। तिलक जी ने
पुणे लौटकर कृष्णाजी पन्त खाडिलकर और हणमन्तराव कुलकर्णी को नेपाल भेजा। इन्हें यह
काम दिया गया था कि वे नेपाल के अधिकारियों से मिलकर वहां हथियार बनाने की
सम्भावनाओं का पता लगायें।
सुनन्दा की सहायता से उन्हें नेपाल में प्रवेश मिल गया।
वहाँ पशुपतिनाथ मंदिर में महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत के ब्राह्मण ही पुजारी होते
हैं। उनके परिवारजन के नाते वे दोनों वहां रहने लगे। उस समय नेपाल के
प्रधानमन्त्री महाराणा चन्द्र शमशेर बहादुर थे। एक अभियन्ता कर्नल कुमार नरसिंह के
माध्यम से उनका सम्पर्क प्रधानमन्त्री और अनेक बड़े अधिकारियों से हो गया।
इन दोनों को वहां मंगलौरी टाइल्स का कारखाना लगाने की
स्वीकृति मिल गयी। उसके लिए आवश्यक यन्त्र यूरोप से आने थे। इन यन्त्रों से टाइल्स
के साथ-साथ हथियार भी बन सकते थे। इस कार्य में ग्वालियर की सेना में काम कर चुके
श्री केतकर भी इनकी सहायता कर रहे थे। नेपाल शासन ने कुछ छात्रों को छात्रवृत्ति
देकर प्रशिक्षण के लिए जापान भेजने की योजना बनाई थी। इसमें भी श्री खाडिलकर का
नाम स्वीकृत हो गया था।
जब कुछ यन्त्र समुद्र मार्ग से कोलकाता आ गये, तो उसे लेने के
लिए श्री खाडिलकर कोलकाता गये; पर इसी बीच ब्रिटिश सरकार को कुछ संदेह हो गया। उसने नेपाल
सरकार को इसके लिए डांटा और इसे बन्द करने को कहा। नेपाल यद्यपि स्वतन्त्र देश था; पर छोटा होने से
डर कर उसने इस फैक्ट्री का अनुज्ञापत्र (लाइसेंस) निरस्त कर दिया। श्री खाडिलकर
पुणे लौट गये और श्री कुलकर्णी का देहान्त हो गया। इस प्रकार यह योजना पूरी नहीं
हो पायी।
1907 में इस योजना की
सूत्रधार सुनन्दा का भी निधन हो गया। यदि वे जीवित रहतीं, तो शायद कोई नयी
योजना बनातीं; पर ईश्वर की
इच्छा ही प्रबल है। रानी लक्ष्मीबाई की निकट सम्बन्धी, स्वतन्त्रता
सेनानी सुनन्दा के बारे में पूरी जानकारी हो सके, इसके लिए शोध की पर्याप्त आवश्यकता है।
(संदर्भ: साहित्य
अमृत, अगस्त 2013...आदि)
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संघ शाखा, राजनीति और फिर वनवासी कल्याण आश्रम में कार्यरत श्री रामभाऊ बिन्दुराव गोडबोले का जन्म 1920 में कस्बापेठ (पुणे, महाराष्ट्र) में हुआ था। वे पुणे में ही 1935 में स्वयंसेवक बने थे। उन्होंने संस्कृत में विशेष योग्यता के साथ एम.ए. किया था। 1942 में श्री गुरुजी के आह्नान पर वे प्रचारक बने और पहले सांगली तथा फिर पुणे भेजे गये। पुणे में उन्होंने बाल स्वयंसेवकों का ‘झांझीवार बैंड’ बनाया। इसमें ढोल, डमरू, झांझ, घंटा आदि होते थे। वहां उन्होंने रात्रि शाखाएं भी खोलीं। वे स्वयंसेवकों से बहुत स्नेह करते थे; पर विरोधियों को ठोकने में भी माहिर थे। एक बार पुणे में श्री गुरुजी के आगमन पर समाजवादियों ने उनकी ‘प्रेत यात्रा’ निकाली। रामभाऊ ने कार्यक्रम के बाद उनकी खूब धुनाई की। वे मारपीट को कार्यकर्ताओं के लिए ‘टॉनिक’ मानते थे। 1948 के प्रतिबंध काल स्वयंसेवकों को कष्ट देने वालों का भी ऐसे ही सत्कार किया गया।
1953 में जब महाराष्ट्र में श्री रामभाऊ म्हालगी ने ‘भारतीय जनसंघ’ का काम प्रारम्भ किया, तो रामभाऊ को उनके साथ लगाया गया। उनके परिश्रम और सम्पर्क से जनसंघ ने शीघ्र ही जड़ पकड़ ली। 1957 में वे विधानसभा के सदस्य चुने गये। जनसंघ के नेतृत्व में हुए ‘गोवा मुक्ति आंदोलन’ में बाहर से आये सत्याग्रहियों की व्यवस्था उनके ही जिम्मे थी। जब सरकार ने कच्छ का कुछ भाग पाकिस्तान को देना चाहा, तो उसके विरुद्ध हुए आंदोलन का संचालन रामभाऊ ने ही किया। मुंबई में वर्तमान भा.ज.पा. और उसके बगल में वनवासी कल्याण आश्रम कार्यालय ‘चंचल स्मृति’ उनके प्रयास से ही बने।
वे हर काम बड़ा लक्ष्य लेकर पूरी शान से करते थे। धनसंग्रह हेतु उन्होंने नृत्यांगना जयमाला शिरोलकर और रोहिणी भाटे तथा गायक सुधीर फड़के, भीमसेन जोशी व लता मंगेशकर के कार्यक्रम किये। वे चंदे के लिए कार से ही जाते थे। ‘मराठा’ पत्र के वामपंथी मालिक आचार्य अत्रे, अभिनेत्री वैजयन्ती माला, न्यायाधीश अब्दुल करीम छागला आदि को वे जनसंघ के मंच पर लाये। एक बार ‘मराठा’ पत्र खरीदने के लिए उन्होंने धनसंग्रह किया; पर काम न होने पर पैसा लोगों को लौटा दिया। इस पारदर्शिता की सर्वत्र सराहना हुई।
1967 में रामभाऊ को जनसंघ के काम के लिए बंगाल भेजा गया। वहां वे 1973 तक रहे। इसके बाद उन्हें केन्द्रीय मंत्री की जिम्मेदारी देकर दिल्ली बुला लिया गया; पर आपातकाल के बाद उन्हें राजनीति से अरुचि हो गयी। अतः जब ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के काम को राष्ट्रीय स्वरूप दिया गया, तो उन्हें उसका ‘राष्ट्रीय संगठन मंत्री’ बनाया गया। यद्यपि इसका मुख्यालय जशपुर नगर में था; पर रामभाऊ मुंबई से ही उसका संचालन करते थे।
मुंबई से उन्होंने कल्याण आश्रम के लिए खूब साधन जुटाए। राष्ट्रीय राजधानी होने के नाते उन्होंने दिल्ली में भी एक कार्यालय बनाया। उन्होंने ’धनुषधारी वनवासी’ को संस्था का प्रतीक चिõ बनाया तथा प्रचार-प्रसार के लिए ‘वनबंधु’ पत्रिका प्रारम्भ की। शीघ्र ही सब राज्यों में कार्यकर्ताओं की टोेली खड़ी हो गयीं। इनमें संघ के प्रचारक, पूर्णकालिक, अंशकालिक, गृहस्थ, पुरुष, महिला आदि सभी प्रकार के लोग थे।
कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए रामभाऊ ने प्रांत तथा राष्ट्रीय स्तर के कई शिविर व सम्मेलन किये। 1985 में भिलाई में हुए राष्ट्रीय महिला सम्मेलन में स्वाधीनता सेनानी नागा रानी मां गाइडिन्ल्यू पधारीं। 1987 में मुंबई में वनवासी बच्चों व युवाओं की खेलकूद प्रतियोगिता हुई। प्रशिक्षण की स्थायी व्यवस्था हेतु उन्होंने दादरा नगर हवेली में ‘रांधा’ नामक स्थान पर ‘सूर्य निकेतन’ की स्थापना की। श्री रामभाऊ गोडबोले का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था। अतः 1988 में संगठन सम्बन्धी सब कामों से अवकाश लेकर वे पुणे में अपनी भांजी के पास रहने लगे। 2003 में मुंबई में ही उनका शरीरांत हुआ।
(संदर्भ : हिन्दी विवेक, फरवरी 2014/हमारे महान वन नायक)
लाडली फाउंडेशन एवं
देवेन्द्र कुमार
कहते हैं कि हर सिक्के के
दो पहलू होते हैं। भगवान यदि एक दरवाजा बंद करता है, तो संकल्प के धनी
लोगों के लिए एक खिड़की जरूर खोलता है। दिल्ली निवासी देवेन्द्र कुमार ऐसे ही
व्यक्तित्व का नाम है।
देवेन्द्र कुमार के माता
पिता की आपस में नहीं पटती थी। जब वे केवल दो साल तथा उनकी छोटी बहिन केवल तीन दिन
की थी, तो वे इन बच्चों को एक मलिन बस्ती में रहने वाली दादी के
पास छोड़कर न जाने कहां चले गये। दादी और अविवाहित बुआ ने इन दोनों बच्चों को
संभाला। दो साल बाद देवेन्द्र कुमार का नाम एक सरकारी स्कूल में लिखवा दिया गया।
बुआ कुछ सिलाई आदि कर लेती थीं। उसी से घर का काम चलता था।
देवेन्द्र जब आठ साल के
हुए, तो वे गुब्बारे बेचने लगे। क्योंकि अकेली बुआ की आमदनी से
घर का खर्चा नहीं चल पा रहा था; पर एक दिन उसके कुछ
समवयस्क नशेड़ी लड़कों ने उसे पीटकर उससे पैसे छीन लिये। इस पर बुआ ने उन्हें
गुब्बारे बेचने से मना कर दिया; पर पढ़ाई बंद नहीं की।
कुछ दिन बाद देवेन्द्र की उन सब लड़कों से दोस्ती हो गये। वे सब शाम को कबड्डी
खेलते थे। इसमें शारीरिक श्रम की बहुत जरूरत होती थी। कुछ समय बाद देवेन्द्र ने
अनुभव किया कि खेल में रुचि के कारण कई लड़कों ने नशा छोड़ दिया। इससे उन लड़कों के अभिभावक
देवेन्द्र को बहुत प्यार करने लगे।
कुछ समय बाद देवेन्द्र ‘भारतीय रेडक्राॅस’ से जुड़ गये। 15 वर्ष की अवस्था
में वे एक मैडिकल स्टोर पर काम करने लगे। यहां से पैसे तो कुछ खास नहीं मिलते थे; पर उन्हें सब नशीली दवाओं के बारे में पता लग गया। ये बिना डाॅक्टरी पर्चे के
नहीं बिक सकतीं;
पर मैडिकल स्टोर वाले इन्हें ऐसे ही दे देते थे
तथा इनके बदले बच्चों से गलत काम कराते थे। दो साल वहां काम करने के बाद उन्होंने
पुलिस और ड्रग्स कंट्रोल विभाग के सहयोग से ऐसी 13 दुकानें सील करा
दीं। इससे उनके जीवन को एक सार्थक दिशा मिली।
कक्षा दस तक वे किसी तरह
पहुंचे; पर उसे उत्तीर्ण करने से पहले ही पढ़ाई छूट गयी। क्योंकि घर
चलाने के लिए पैसे चाहिए थे। इस दौरान एक डाॅक्टर ने उन्हें 250 रु. मासिक पर अपने यहां रख लिया। यहां उन्होंने बहुत लगन से काम
किया और बहुत कुछ सीखा। इसी समय एक बड़े अस्पताल के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी।
अस्पताल के मालिकों ने देवेन्द्र तथा उसके कई मित्रों को कई गुना वेतन पर अपने
यहां रख लिया। इस कारण अगले दस साल तक देवेन्द्र का जीवन एक निश्चित पटरी पर चलता
रहा।
अब उन्हें अपनी बहिन के
विवाह की चिंता हुई; पर हर जगह दहेज का दानव सामने आ जाता था।
सौभाग्यवश एक परिवार उन्हें मिल गया और बहिन का विवाह हो गया। इस दौरान उन्हें
अनुभव हुआ कि उनकी तथा आसपास की बस्तियों में हजारों लड़कियां इसलिए अविवाहित हैं
चूंकि उनके अभिभावकों के पास दहेज के पैसे नहीं हैं। अतः कई लड़कियां अवसाद में
चली जाती हैं तथा कई असामाजिक तत्वों के शोषण में फंस जाती हैं। इसके समाधान के
लिए उन्होंने कुछ मित्रों के साथ ‘लाडली फाउंडेशन’ संस्था का गठन किया।
वर्ष 2012 में उन्होंने पहली बार 44 कन्याओं का विवाह कराया।
उनके माता पिता गरीब तो थे ही, अशिक्षित भी थे। लाडली
फाउंडेशन ने विवाह से पहले उन सब युवकों के बारे में भी भरपूर छानबीन की। इससे
सद्कार्य की एक धारा चल निकली। अब तक लाडली फाउंडेशन हजारों कन्याओं का विवाह करा
चुका है। संस्था अब निर्धन बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने का काम भी करती है। अब उसकी
भारत के कई राज्यों में शाखाएं है। सरकार ने देवेन्द्र कुमार को इसके लिए ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया है।
ऐसे समाजसेवी युवक का
जीवन सबके लिए प्रेरणास्पद है।
(हिन्दुस्तान 31.5.26/12, चंद्रकांत सिंह)
